भारत और नेपाल दोनों देशों के बीच 1950 की द्विपक्षीय संधि की समीक्षा को तैयार हो गए हैं। संधि की समीक्षा की मांग नेपाल की ओर से उठाई गई जिसे इसके तहत कई लाभ हासिल होते हैं। वहाँ भारत का ध्यान अपने सुरक्षा हितों पर रहेगा।
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लेकिन क्या है इस 64 साल पुरानी संधि में? इस बारे में बता रहे हैं दक्षिण एशिया मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि, जो कहते हैं कि नेपाल ही बताएगा कि वह क्या बदलाव चाहता है।
भारत नेपाल संधि की समीक्षा की बात नेपाल ने शुरू की है लेकिन ये नई नहीं है। मोदी सरकार का यह कहना कि आप संधि की समीक्षा करना चाहते हैं तो कीजिए। यह भारत सरकार की बहुत पुरानी नीति है। इस संधि के दो पहलू हैं। एक में भारत के हित और उसकी सुरक्षा का ख़्याल रखा गया है। दूसरा पहलू नेपाल के हितों का है।
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भारतीयों को वही हक़ नहीं
इसका प्रमाण यह है कि बड़ी संख्या में आने वाले नेपाली भारत में प्रॉपर्टी ख़रीद सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, व्यापार कर सकते हैं, ऊंचे पदों पर पहुंच सकते हैं। सिर्फ़ वे आईएएस, आईएफ़एस नहीं बन सकते और चुनाव नहीं लड़ सकते।
संधि में कहा गया है कि जो हक़ नेपालियों को मिले वही भारतीयों को भी मिले। लेकिन नेपाल में ये हक़ भारतीयों को नहीं मिलता। इसलिए संधि में जो समानता के आधार की बात होती है वह एकतरफ़ा है।
भारत के लिए सुरक्षा महत्वपूर्ण है। संधि में कहा गया है कि विकास के कार्यों में भारत नेपाल को प्राथमिकता दे, लेकिन नेपाल इसे कभी का भुला चुका है।
नेपाल ऐसा काम न करें जिससे भारत को खतरा हो
संसाधन विकास की जो संधियां हुई हैं, उन्हें संसद में दो-तिहाई बहुमत से मंज़ूरी मिलनी चाहिए - जो कभी नहीं मिलती है। जो भी संधियां या अनुबंध हुए हैं उनका ठीक से क्रियान्वयन नहीं किया जाता है।
भारत को अगर अपना हित देखना है तो वो यह कहेगा कि जो हम आपके लिए करते हैं, आप भी हमारे नागरिकों के लिए कीजिए।
यह नेपाल के लिए संभव नहीं होगा। नेपाल यह चाहता भी नहीं है। दूसरा भारत यह चाहेगा कि नेपाल कोई ऐसा काम न करे, जिससे भारत की सुरक्षा को ख़तरा हो। क्योंकि नेपाली आसानी से भारत में आ सकता है इसलिए बहुत सारे पाकिस्तानी नेपाल के रास्ते भारत में आ जाते हैं, वीज़ा हो या न हो।
अगर उन्होंने फ़र्ज़ी नेपाली पहचान पत्र हासिल कर लिया तो पासपोर्ट बनाने की ज़रूरत ही नहीं, वह कह सकते हैं कि हम नेपाली हैं।
चीन का भारत को डर
भारतीय सुरक्षा बल आरोप लगाते रहे हैं कि नेपाल से जाली मुद्रा भारत आ रही है। अगर चीन का प्रभाव तराई में बढ़ेगा तो भारत को यह डर रहेगा कि नक्सलवादियों या अन्य चरमपंथियों तक चीन जब चाहे पहुंच सकता है।
भारत को दोनों देशों के विकास को साथ लेकर चलने की पहल करनी चाहिए, जिसके स्पष्ट संकेत प्रधानमंत्री मोदी ने दिए हैं। पनबिजली, सड़क जोड़ना, व्यापार के मामलों में दोनों देश एक-दूसरे के सहयोग के बिना आगे नहीं बढ़ सकते।
नेपालियों को यह शिकायत है कि वे जो हथियार ख़रीदते हैं, उन्हें इसके लिए भारत को पूछना पड़ता है। संधि में लिखा हुआ है कि नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है। इसके साथ ही उसमें लिखा है कि अगर किसी तीसरे राज्य से कोई ख़तरा होता है तो दोनों देश आपस में सलाह करेंगे।
नेपाल कहता है कि आप हमसे तो पूछते नहीं हो और हम पर दबाव डालते हो कि हम बताएं कि चीन के साथ क्या हो रहा है, पाकिस्तान के साथ क्या हो रहा है। लेकिन इसमें पेंच यह है कि अगर समुद्र की ओर से भारत को चीन या पाकिस्तान से ख़तरा होता है तो उससे नेपाल पर कोई असर नहीं पड़ता। फिर भी इस संधि पर दोनों पक्षों को गंभीरतापूर्वक चर्चा करने की ज़रूरत है।