दिल्ली में सूपड़ा साफ होने के बाद कांग्रेस का राजनीतिक संकट गहरा गया है। पार्टी के शीर्ष स्तर पर दुविधा भी है ,आशंका भी है और खींचतान भी बढ़ गई है। लगातार मिल रही शर्मनाक पराजय के बाद कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी को लेकर भी खींचतान शुरु हो गई है।
राहुल समर्थक युवा ब्रिग्रेड ने दबाव बढ़ा दिया है कि जितनी जल्दी हो सके राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाकर नेतृत्व में जारी असमंजस और दुविधा खत्म की जाए। जबकि राहुल की कार्यशैली से खफा बुजुर्ग नेता इसके खिलाफ हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक नेहरू गांधी परिवार के एक बेहद वफादार बुजुर्ग कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य ने सोनिया गांधी से मिलकर मार्च में कांग्रेस अधिवेशन में राहुल की ताजपोशी न करने और प्रियंका गांधी को आगे लाने का आग्रह किया है।
राहुल केवफादार नेताओं का जोर है कि इसी साल मार्च में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में राहुल की ताजपोशी कर दी जाए। इससे न सिर्फ राहुल को फैसले लेने की स्वतंत्रता होगी बल्कि पार्टी का भी ऊपर से नीचे तक कायापलट हो सकेगा और कांग्रेस भावी चुनौतियों का मुकाबला भी कर सकेगी।
लेकिन सोनिया गांधी के करीबी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल की ताजपोशी को कुछ समय और टालने की मुहिम तेज कर दी है। उनका कहना है कि अभी वक्त और माहौल कांग्रेस के खिलाफ है,ऐसे में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का मतलब पूरी तरह उन्हें विफल कर देना होगा। इसलिए इस साल नवंबर में बिहार चुनावों में भाजपा अगर हारती है तब इसके बाद राहुल को पार्टी की कमान सौंपी जाए।
आम आदमी पार्टी बड़ा खतरा
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में भाजपा को पटखनी दी है, उससे दिल्ली के बाद अब पूरे देश में कांग्रेस के सबसे बड़े अल्पसंख्यक जनाधार के आम आदमी पार्टी के साथ जाने का खतरा पैदा हो गया है। इसका राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए बेहद फूंक फूंक कर कदम रखने की जरूरत है।
इसलिए कोई भी फैसला पार्टी को जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी के करीबी कांग्रेस के एक युवा सचिव ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि फूंक फूंक कर कदम रखने की वजह से ही पार्टी कोई निर्णय नहीं ले पा रही है और लोकसभा से लेकर दिल्ली विधानसभा के चुनावों तक कांग्रेस विपक्षी दलों की फूंक से उड़ती जा रही है।
इसलिए अब नेतृत्व के मामले में जल्दी फैसला लेने की जरूरत है और जब राहुल गांधी को देरसबेर पार्टी अध्यक्ष बनना ही है तो देर क्यों की जाए।
कई राज्यों में चुनाव से बढ़ी बैचेनी
कांग्रेस के सामने आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत से सबसे बड़ी चुनौती देशभर में अपने अल्पसंख्यक वोट को सहेजे रखने की खड़ी हो गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, प.बंगाल,जैसे राज्यों में पहले से ही कांग्रेस का यह जनाधार सपा, जद(यू), राजद और तृणमूल कांग्रेस के पास चला गया है।
दिल्ली में जिस तरह मोदी बनाम केजरीवाल की लड़ाई में अरविंद केजरीवाल भारी पड़े हैं, उससे देशभर के मुसलमानों में यह संदेश गया है कि राहुल गांधी के मुकाबले अरविंद केजरीवाल मोदी केनेतृत्व वाली भाजपा को पटखनी देने में ज्यादा सक्षम हैं। एक कांग्रेस नेता के मुताबिक अब कांग्रेस के सामने राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी अपनी जमीन बचाने की चुनौती है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के चार सांसद हैं और पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का आप की वजह से खासा नुकसान हुआ था। कांग्रेस को अपनी वापसी की सबसे ज्यादा संभावना पंजाब में ही दिख रही है जहां 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन अब आम आदमी पार्टी भी वहां ताल ठोंकेगी, जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस की संभावनाओं पर पड़ेगा।
राहुल गांधी की टीम पर उठे सवाल
इन नई परिस्थितियों में कांग्रेस के भीतर जबर्दस्त रस्साकशी तेज हो सकती है। पार्टी के पहली कतार के पुराने नेता अब तक की विफलताओं की वजह जनमानस से राहुल गांधी की संवादहीनता और उनकी टीम कनिष्क सिंह, दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री, सी.पी.जोशी, जयराम रमेश, पी.सी.चाको, जीतेंद्र सिंह, मोहन प्रकाश, मोहन गोपाल के कामकाज को मानते हैं।
इन नेताओं का कहना है कि जब तक सोनिया गांधी और और अहमद पटेल, ए.के.एंटनी, मोतीलाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद जैसे उनके वफादार नेताओं के हाथ में कमान रही, पार्टी लगातार जीतती रही, लेकिन जब से राहुल की टीम ने कमान संभाली है, कांग्रेस हारती चली जा रही है।
इसलिए पुराने नेता अभी भी सोनिया को ही अध्यक्ष बनाए रखने और उनकी टीम को महत्व देने की वकालत कर रहे हैं, जबकि राहुल गांधी के वफादार नेताओं, जिनमें ज्यादातर युवा हैं, का कहना है कि राहुल गांधी जिस तरह पार्टी में आमूल चूल बदलाव चाहते हैं, पुराने नेता उसमें लगातार रोड़ा अटका रहे हैंऔर सोनिया गांधी अपने वफादार नेताओं के दबाव में राहुल को वह स्वतंत्रता नहीं दे रही हैं जो उन्हें मिलनी चाहिए। इसलिए राहुल का जल्दी से जल्दी अध्यक्ष बनना जरूरी है।