इस समय देशभर में प्रस्तावित फूड सिक्योरिटी बिल पर खूब चर्चा हो रही है। सरकार इसे 2014 के आगामी चुनावों के संदर्भ में अपने प्रमुख हथियार के रूप में देख रही है लेकिन आम लोगों के जेहन में इस बिल को लेकर तरह–तरह के सवाल उठ रहे हैं।
मसलन कि क्या यह विधेयक देश में व्याप्त भुखमरी, कुपोषण, और खाद्य असुरक्षा की स्थिति को ख़त्म करने की क्षमता रखता है? क्या उत्पादन, भंडारण और विकेंद्रीकरण पर नीति स्पष्ट किये बिना इस क़ानून को सरकार की एक ईमानदार पहल माना जा सकता है?
सवाल ये भी है कि सरकार को फूड सिक्योरिटी बिल के लिए अब इतनी जल्दबाजी क्यों? इस योजना के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण अब तक क्यों नहीं हुआ? कहीं इस बिल का हश्र भी शिक्षा के अधिकार कानून जैसा तो नहीं हो जाएगा? खाद्य बिल का मकसद आम चुनाव में वोट हासिल करना तो नहीं?
क्या है ये फूड सिक्योरिटी बिल?
फूड सिक्योरिटी बिल की ख़ास बात यह है कि इससे देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलने का प्रावधान किया गया है। इस बिल में लाभ प्राप्त करने वालों को प्राथमिकता वाले परिवार और सामान्य परिवारों में बांटा गया है।
प्राथमिकता वाले परिवारों में ग़रीबी रेखा से नीचे गुज़र-बसर करने वाले और सामान्य कोटि में ग़रीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को रखे जाने की बात कही गई है।
इस बिल के प्रावधानों के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को चावल तीन रुपये प्रति किलो और गेहूं 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से दिए जाने की योजना है। ज्वार, बाजरा जैसा मोटा अनाज एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिलेगा।
इस योजना का देश के 67 फीसदी लोगों को फायदा मिलेगा। देश की करीब 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी इस कानून के दायरे में आएगी।
इस विधेयक के तहत सरकार प्राथमिकता श्रेणी वाले प्रत्येक व्यक्ति को सात किलो चावल और गेहूं देगी।
जबकि सामान्य श्रेणी के लोगों को कम से कम तीन किलो अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधे दाम पर दिया जाएगा।
ग्रामीण क्षेत्रों की 75 प्रतिशत आबादी को इस विधेयक का लाभ दिया जाएगा, जिसमें से कम से कम 46 प्रतिशत प्राथमिकता श्रेणी के लोगों को दिया जाएगा।
शहरी इलाक़ों में कुल आबादी के 50 फ़ीसदी लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी और इनमें से कम से कम 28 प्रतिशत प्राथमिकता श्रेणी के लोगों को दिया जाएगा।
इसके अलावा गर्भवती महिलाओं, बच्चों को दूध पिलाने वाली महिलाओं, आठवीं कक्षा तक पढ़ने वाले बच्चों और बूढ़े लोगों को पका हुआ खाना मुहैया करवाया जाएगा। साथ ही स्तनपान कराने वाली महिलाओं को महीने के 1,000 रुपए भी दिए जाएंगे।
जनवितरण प्रणाली के तहत सरकार हर महीने 6 करोड़ 52 लाख बीपीएल परिवारों को 35 किलो गेहूं और चावल प्रदान करती है। इस योजना के तहत गेहूं 4.15 रुपए में दिया जाता है, जबकि चावल का दाम 5.65 रूपए किलो है।
एपीएल की श्रेणी वाले 11.5 करोड़ परिवारों को 6.10 रुपए में 15 किलो गेहूं और 8.30 रुपए में 35 किलो चावल दिए जाते हैं।
नया क़ानून लागू होने के बाद इससे कम दाम में गेहूं और चावल पाना निर्धन लोगों का क़ानूनी अधिकार बन जाएगा।
राज्यों में मतभेदः क्या है झोल
फूड सिक्योरिटी बिल पर अधिकांश राज्यों ने अपना कड़ा विरोध जताया है। राज्य चाहते हैं कि फूड सिक्योरिटी के खर्चे का बोझ राज्यों पर ज्यादा ना डाला जाए और हकदार तय करने का अधिकार राज्यों के पास हो।
पिछले दिनों बिल पर आम सहमति बनाने के लिए राज्यों के खाद्य मंत्रियों की बैठक चली। लेकिन आम सहमति बनने की बजाए मतभेद और गहराते चले गए। आलम ये रहा कि कि तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ ने तो उन्हें इस बिल के दायरे से बाहर रखने की मांग कर डाली।
जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों ने पूरे देश में एक फॉर्मूले के तहत फूड सिक्योरिटी लागू करने का विरोध किया। उनका कहना है कि इस फॉर्मूले के तहत राज्यों के सभी गरीबों को फूड सिक्योरिटी के दायरे में नहीं लाया जा सकता है इसलिए इसका दायरा बढाया जाए।
इस बिल को लागू करने से पहले राशन की सरकारी दुकानों की व्यवस्था यानी पीडीएस को मजबूत किया जाए। उड़ीसा, केरल और बिहार ने खास तौर से हर महीने हर शख्स को 5 किलो अनाज देने को नाकाफी बताया है।
फूड सिक्योरिटी लागू होने से राज्यों को करीब 36,000 करोड़ रुपये का खर्च उठाना पड़ेगा लेकिन वो इस खर्च को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं।
क्यों जल्दी में है सरकार और कांग्रेस
यूपीए सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में लोगों को सस्ते अनाज की गारंटी का वादा किया था। सरकार चाहती है कि अगले लोकसभा चुनाव में फूड सिक्योरिटी बिल को वह अपनी एक बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश करे। इसलिए जल्द से जल्द संसद से पारित कराना चाहती है।
दरअसल, मनरेगा स्कीम के बूते लगातार दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाने वाली कांग्रेस हर हाल में आम चुनाव से पहले फूड सिक्योरिटी बिल को कानूनी जामा पहनाना चाहती है। कांग्रेस के रणनीतिकार अगले आम चुनाव में इसे गेम चेंजर के रूप में देख रहे हैं।