मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. विनायक सेन ने भले ही माओवादियों से संबंधों से इनकार किया है, लेकिन एक नई किताब में दावा किया गया है कि उन्होंने माओवादियों के लिए संदेशवाहक का काम किया था। यही नहीं, इस किताब में दावा किया गया है कि सलवा जुड़ूम आदिवासियों का कोई स्वस्फूर्त आंदोलन नहीं था, बल्कि इसकी योजना राजधानी दिल्ली में बनी थी।
वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी की दंडकारण्य में माओवाद के इतिहास पर लिखी किताब 'उसका नाम वासू नहीं' में माओवादियों से बातचीत के आधार पर ऐसे ही कई सनसनीखेज खुलासे किए गए हैं। नक्सल नेता सब्यसाची पांडा के हवाले से चौधरी ने लिखा है कि नक्सलियों ने विनायक सेन के पास रायपुर की जेल में बंद वरिष्ठ नक्सली नेता नारायण सान्याल की कानूनी सहायता के लिए 50,000 रुपये भिजवाए थे। इस किताब में इस बात का भी जिक्र है कि जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद जब विनायक सेन ने नक्सली हिंसा की निंदा की तो. कुछ नक्सल नेता चौंक गए।
सलवा जुड़ूम की योजना दिल्ली में बनी
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के जंगलों में नक्सलियों के साथ लेखक ने खासा वक्त गुजारा है और उनका आकलन है कि छत्तीसगढ़ के पृथक राज्य बनने के बाद नक्सलियों की ताकत बढ़ी है। चौधरी ने केंद्र सरकार के एक अधिकारी के हवाले से लिखा है कि नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण अभियान सलवा जुड़ूम की योजना लालकृष्ण आडवाणी के गृहमंत्री रहते दिल्ली में बनी थी और इसे शुरू करने से पहले सरकार ने एक वर्ष तक तैयारी की थी।
माओवादियों का बजट 2010-11 में 10 करोड़ से ऊपर
पेंगुइन इंडिया की ओर से अंग्रेजी और हिंदी दोनो भाषाओं में 19 दिसंबर को दिल्ली में जारी हो रही इस किताब में शुभ्रांशु चौधरी ने दस्तावेजी सुबूतों के आधार पर लिखा है कि जन जागरण अभियान की सूचना देने वाला फैक्स जिस नंबर से आया था, वह स्थानीय पुलिस थाने का था। उन्होंने नक्सलियों के संगठन के ढांचे और उसकी आर्थिक सामारिक व्यवस्था के बारे में भी विस्तार से लिखा है। वरिष्ठ नक्सली नेता कोसा ने उन्हें बताया कि माओवादियों का बजट 2010-11 में 10 करोड़ से ऊपर निकल गया।