उनके घर मैले-कुचैले हैं। उनके कपड़े फटे हैं। घर में एक कमरा है, जिसकी छत टिन की जुगाड़ से बनी है। टॉयलेट के लिए बाहर जाना पड़ता है। बेबस, बदहाल, भूखे और बदकिश्मत, ये अलंकार, विशेषण और उपमाएं उनकी जिंदगी का विचित्र व्याकरण तय कर रहे हैं।
जब आप गर्म चाय की प्याली लेकर चुश्कियां ले रहे होते हैं, तो उधर कई दफा वो भुखमरी से मर रहे होते हैं।
इसे विडंबना कहें या बदकिस्मती कि गरीबी, कुपोषण और शोषण की मार झेल भुखमरी से गुजरते उन लोगों को भी भूख हड़ताल और आंदोलन से गुजरना पड़ता है जिनकी जी-तोड़ मेहनत से आपकी चाय का प्याला तैयार होता है।
लेकिन वो कहावत सुनी होगी आपने... "मरता क्या न करता"। इस पुरानी कहावत की तासीर देखिए कि जैसे ही केरल की कानन देवन हिल्स प्लांटेशन चाय बागान में काम करने वाली महिला मजदूरों ने मिलने वाली बेहद कम मजदूरी के खिलाफ आवाज बुलंद की, तो देर से ही सही सफलता आखिर मिल ही गई।
भुखमरी से जूझते मजदूरों ने की भूख हड़ताल!
टॉपयैप्स की खबर के मुताबिक टाटा समूह की चाय कंपनी के लिए काम करने वाली महिला मजदूरों के बोनस को काटने का फैसला किया था। बीते एक सिंतबर को पत्रियारचल ट्रेड यूनियन भी जब महिला मजदूरो को उनका हक दिलाने में नाकाम रही तो महिला मजदूरों ने एकजुट होते हुए कंपनी के खिलाफ सड़कों पर झंडा बुलंद कर दिया।
जब कुछ महिलाओं ने हो रहे शोषण के खिलाफ हिम्मत दिखाई तो देखते ही देखते करीब 6 हजार महिला मजदूर सड़कों पर जमा हो गईं और अपने हक की मांग करते हुए नारेबाजी करने लगीं।
इन महिलाओं को 230 रुपए की दिहाड़ी पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। महिलाओं की मानें तो इतनी कम रकम में उनकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं, घर का खर्च चलाना तो दूर की बात है।
मसलन, गरीबी की मार से पनपने वाली भुखमरी और कुपोषण और तमाम तरह की बीमारियां इनके परिवारों पर कब हावी हो जाएं पता ही नहीं चलता।
जब चप्पलों से की महिलाओं ने नेता की पिटाई
इसी बीच कई नेताओं, चाया बागान अधिकारियों, व्यापार मंडल के सदस्यों ने महिला मजदूरों की हड़ताल में खूब बाधाएं डालने की कोशिशें कीं, लेकिन महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी जंग जारी रखी।
इसी दौरान मुन्नार से सीपीआई(एम) विधायक एस राजेंद्रन ने महिलाओं से मिलने की सोची तो गुस्साई महिलाओं ने जूते-चप्पलों से उनका स्वागत किया। आनन-फानन में पुलिसिया दखल से उन्हें महिलाओं के चंगुल से बचाया जा सका।
लेकिन महिला मजदूरों को सबसे बड़ी निराश तब हाथ लगी जब पुरुषों की ट्रेड यूनियन ने उनका साथ देने के नाम पर उनके साथ धोखा किया।ट्रेड यूनियन के सदस्यों ने महिलाओं की मदद के नाम पर नाटकीय नारेबाजी की, उन्होंने कहा, "हम पूरे दिन चाय की पत्तियां तोड़ें और तुम हमें लूटो"। "हम अपनी टोकरियों में चाय की पत्तियां लाएं और तुम अपनी टोकरियां रुपए की गड्डियां ले जाओ"। "हम टिन के झोपड़ों में रहें और तुम बंगलों में आराम फरमाओ"।
आखिरकार 13 सिंतबर को मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने दिहाड़ी मजदूरी में सुधार करते हुए उसे 500 रुपए तक देने का ऐलान किया। इसबार पुरुषों की ट्रेड यूनियन ने भी 500 रुपए दिहाड़ी की मांग करते हुए महिलाओं के साथ प्रदर्शन किया।
जीत ली जंग
लेकिन मसले पर लंबे विचार-विमर्श के बाद भी कोई परिणाम सामने नहीं आ सका। चाय बागान वालों ने दिहाड़ी के लिए तय की गई रकम देना स्वीकार नहीं किया और कहा कि इससे केरल के चाय बागानों को भारी घाटे का सामना करना पड़ेगा।
लेकिन दिहाड़ी बढ़ाने की अंतिम तिथी 15 अंक्टूबर को आखिरकार महिला मजदूरों को पूरी तो नहीं थोड़ी राहत तब जरूर मिली जब उन्हें 230 के बजाय 301 रुपए दिहाड़ी देना मंजूर किया गया। इस फैसले साथ महिला मजदूरों ने हड़ताल खत्म कर काम पर आना शुरू कर दिया।
आरएसपी नेता एनके प्रेमाचंद्रन ने कहा कि कम से कम महिला मजदूरों से यूनियनों को सबक जरूर मिला होगा कि उन्हें कम न आंका जाए। और इसी के साथ यूनियन में पुरुषों के वर्चस्व और एकाधिकार को भी चुनौती मिली है। ये अच्छी बात है।
उधर महिला मजदूरों की अगुआई कर रही लिसी सनी की मानें तो उन लोगों के पास हारने के लिए कुछ था ही नहीं। भुखमरी उनकी रोज की जिंदगी का हिस्सा है। अगर वो भूख से मर भी जाते तो उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं, लेकिन उन्होंने तय किया कि किसी भी कीमत पर शोषण को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बस, अब बहुत हो चुका।