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क्या ताज की भी दुर्गति कराना चाहते हैं आजम?

Mon, 24 Nov 2014 03:49 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, अलीगढ़
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ताजमहल को वक्फ बोर्ड संपत्ति दर्ज करने की मांग कर सूबे के कैबिनेट मंत्री आजम खां ने विवाद तो खड़ा कर दिया, लेकिन वक्फ बोर्ड के कारनामों पर नजर नहीं डाली। मुगलिया शहर में वक्फ बोर्ड के पास जामा मस्जिद और फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह सहित 1682 संपत्तियां हैं। वक्फ बोर्ड ने इन संपत्तियों से कमाई तो की, लेकिन रखरखाव का जिम्मा एएसआई के कंधों पर डाल दिया।
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जामा मस्जिद में तो अवैध रूप से 85 दुकानें बनाकर किराए पर भी दे दीं, जिनमें कबाड़ का काम कभी भी बड़ा हादसा करा सकता है। वहीं, वक्फ बोर्ड के किराए के लालच से जामा मस्जिद की नींव पूरी तरह से खोखली हो चुकी है।

दिल्ली में हाईकोर्ट के फैसले पर जामा मस्जिद से व्यवसायिक गतिविधियां और दुकानें हटा दी गईं, लेकिन ताजनगरी में न केवल यह जारी है, बल्कि जामा मस्जिद के अस्तित्व के लिए ही खतरनाक साबित हो रही हैं।
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30 साल में क्या से क्या हो गया?

महज 30 साल पहले जामा मस्जिद के नीचे पक्की दुकानें नहीं थीं। इस दौरान वक्फ बोर्ड ने अवैध रूप से जामा मस्जिद के बरामदों में दुकानें तामीर करा दीं। उन्हें किराए पर भी उठा दिया। कागजों पर हर महीने 17 हजार रुपये इसका किराया है, जबकि असल रकम कहीं ज्यादा है। जो दुकानें बरामदे में उठाई गई उनके दुकानदारों ने मस्जिद की दीवार को ही खोखला कर दुकानों का दायरा बढ़ा लिया।

अब मस्जिद की बुनियाद बेहद कमजोर हो चुकी है। इसीलिए एएसआई सालों से टूटी एक मीनार को दुबारा नहीं लगवा सकी। दरअसल, मीनार का 25 टन वजन है, जिसे खोखली बुनियाद झेलने में सक्षम है या नहीं, इसकी जांच आईआईटी से कराई जा रही है।

इस्लामिया लोकल एजेंसी के चेयरमैन असलम कुरैशी का कहना है कि जामा मस्जिद में दुकानें मेरे कार्यकाल से पहले की हैं। हम तो किराया वसूलते हैं। मालिकाना हक दुकानों पर वक्फ बोर्ड का है, एएसआई केवल मेंटेनेंस का काम करता है। इमाम और मुफ्ती को हथिया (तनख्वाह) बोर्ड देता है।

कमाई वक्फ बोर्ड की, खर्चा एएसआई का

जामा मस्जिद की तरह फतेहपुर सीकरी दरगाह परिसर वक्फ बोर्ड के पास है। यहां 178 गाइड काम करते हैं। जिनकेलाइसेंस की रिन्यूवल की आधी फीस वक्फ बोर्ड लेता है। प्रति गाइड की रिन्यूवल फीस एक हजार रुपये है। दरगाह परिसर में सफाई से लेकर संरक्षण तक पर खर्च एएसआई करता है।

कमाई के सभी साधन वक्फ बोर्ड के पास हैं, जबकि खर्चा एएसआई की जिम्मेदारी है। बुलंद दरवाजे और दरगाह परिसर के अंदर अवैध दुकानों से लेकर चादर तक की बिक्री वक्फ बोर्ड पदाधिकारियों की शह पर होती है।

यह बड़ी संपत्तियां
वक्फ बोर्ड के आंकड़ों पर नजर डाले तो ताजनगरी में 1602 सुन्नी प्रापर्टी है और 80 शिया वक्फ संपत्तियां हैं। इसके अलावा सात सौ प्रापर्टी बिना रजिस्टर्ड है। विभाग के अनुसार न्यू आगरा कर्बला, वक्फ मीर नियाज अली, शोबिया, ताजगंज की दर्जनों प्रापर्टी, वजीरपुरा, जामा मस्जिद, अकबरी मस्जिद, ईदगाह के पास का हिस्सा व पचकुइंया कब्रिस्तान आदि बड़ी वक्फ संपत्तियां हैं।
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वक्फ बनाने का मकसद

खुदा की राह में बिना किसी लालच के कोई चीज देना वक्फ कहलाता है। इसी मकसद से संपत्तियों को दिया गया। ताकि इन संपत्तियों से अर्जित धन को समाज की तरक्की में खर्च किया जा सके।
 
सिर्फ दिखावे का इंस्पेक्टर
आगरा में एक वक्फ इंस्पेक्टर को बैठाया है, लेकिन बोर्ड ने कोई अधिकार नहीं दिया। वक्फ एक्ट 1995 के अनुसार समस्त अधिकार सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ के पास है। बोर्ड ही मुतवल्ली की नियुक्ति और पदमुक्त करेगा। इंसपेक्टर का काम सिर्फ अवैध कब्जों और निर्माण की रिपोर्ट बोर्ड को देना है।

रसीद में करते हैं खेल
संपत्तियों पर काबिज मुतवल्ली वक्फ बोर्ड को इनकम का सिर्फ सात फीसदी हिस्सा ही भेजते हैं। बाकी का पैसा समाज कल्याण के नाम पर उनकी जेबों में जाता है। मुतवल्ली रसीद में खेल करते हैं।

अधिवक्ता अमीर अहमद का कहना है कि वक्फ की संपत्तियों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं। बोर्ड की भूमिका भी संदिग्ध है। ताजमहल को वक्फ में देने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

उत्तरप्रदेश सर्वदलीय मुस्लिम एक्शन कमेटी जिलाध्यक्ष सैयद इरफान सलीम ने बताया कि वक्फ संपत्तियों को सिर्फ बर्बाद किया जा रहा है। हजारों एकड़ जमीन वक्फ प्रापर्टी थी, लेकिन कहीं दिखाई नहीं देती। इसके जिम्मेदार मुतवल्ली ही हैं।
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