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एक रेलवे स्टेशन, जिसे खुद गांव वाले चलाते हैं

Sat, 12 Sep 2015 05:42 PM IST
आरज़ू आलम
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उत्तरी-पश्चिमी रेलवे ने जयपुर डिविजन के स्टेशन रशीदपुरा खोरी को 2005 में घाटे के चलते बंद कर दिया था।आस-पास के गांव पलथाना, रशीदपुरा खोरी एवं प्रतापगढ़ की लगभग बीस हजार की आबादी यात्रा के लिए इस पर निर्भर है।
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पलथाना के निवासी रामू राम कहते हैं, “गांव वालों ने रेलवे को चिट्ठियाँ लिखीं, अधिकारियों के चक्कर लगाए, फिर सबने मिलकर आंदोलन किया।’’साल 2009 में स्टेशन को दोबारा शुरू करने पर रेलवे राजी तो हुई लेकिन तीन लाख रुपए के टिकट खरीदे जाने की शर्त पर। मेहलचंद बताते हैं, ‘‘हमने चंदा कर पैसे कुछ माह में जुटा लिए और ट्रेनें चलने लगीं।”

रेलवे की शर्त को पूरा करने के लिए एक-एक आदमी दस-दस टिकट लेकर सफर करता था।पिछले छह साल से स्टेशन गांव वालों के भरोसे चल रहा है। समय-समय पर स्टेशन की सफ़ाई आस-पास के गांववाले करते हैं, स्टेशन पर मुसाफिरों के लिए पीने के पानी की सप्लाई भी गांववाले खुद करते हैं।
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25 लाख की टिकट कटीं

स्थानीय निवासी महेश सिंह के अनुसार गांव के कुछ लोग निगरानी करते हैं कि कोई भी बिना टिकट सफर न करें। शुरुआती कुछ समय तक टिकट काटने का काम ट्रेनों के गार्ड करते रहे पर बाद में टिकट काटने का जिम्मा खोरी गांव के विजय कुमार ने उठाया।

विजय बताते हैं, “मैं पहले से ही लक्ष्मणगढ़ से एडवांस टिकट खरीद कर रख लेता हूं और बेचते वक्त उस पर तारीख की मुहर मार देता हूं। जितने पैसे की टिकट बिकती है उसका 15 प्रतिशत कमीशन मुझे मिलता है।”

दोबारा शुरू होने के बाद इस रेलवे स्टेशन पर रोज 250 से ज्यादा टिकट कटती हैं और अब तक लगभग 25 लाख रुपए की करीब साढ़े पांच लाख टिकटें काटी जा चुकी हैं। वह पिछले पांच साल से स्टेशन पर टिकट काटने का काम कर रहे हैं। ट्रेनों के आने के समय वह स्टेशन पर टिकट काटने पहुंच जाते हैं।

विजय बताते हैं, “मैं पहले से ही लक्ष्मणगढ़ से एडवांस टिकट खरीद कर रख लेता हूं और बेचते वक्त उस पर तारीख की मुहर मार देता हूं। जितने पैसे की टिकट बिकती है उसका 15 प्रतिशत कमीशन मुझे मिलता है।”

दोबारा शुरू होने के बाद इस रेलवे स्टेशन पर रोज 250 से ज्यादा टिकट कटती हैं और अब तक लगभग 25 लाख रुपए की करीब साढ़े पांच लाख टिकटें काटी जा चुकी हैं।
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