उत्तर प्रदेश में अपना पुराना आधार हासिल करने के लिए हाथ पैर मार रही भाजपा अब वरुण गांधी पर नया दांव लगाएगी।
रविवार को घोषित पार्टी की राष्ट्रीय टीम से राज्य के बड़े दिग्गजों की विदाई के बीच वरुण को राष्ट्रीय महासचिवों की अहम टीम में शामिल कर आलाकमान ने इस आशय का स्पष्ट संदेश दिया है।
हालांकि वरुण को मिल रहे विशेष महत्व को दो गांधियों (वरुण और राहुल गांधी) की भावी जंग के रूप में भी देखा जा रहा है, मगर सच्चाई इसके उलट है।
दरअसल राज्य में हिंदुत्व के मुद्दे पर फिर से दो-दो हाथ की तैयारी कर रही चुकी पार्टी की रणनीति के खांचे में वरुण पूरी तरह फिट बैठ रहे हैं।
लोकसभा चुनाव में पार्टी की योजना राज्य में नरेंद्र मोदी, उमा भारती और वरुण की तिकड़ी के सहारे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की है।
टीम राजनाथ में वरुण को बड़ी कुर्सी तो पहले से ही तय मानी जा रही थी, लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि इसकी कीमत राज्य के बड़े दिग्गजों को चुकानी पड़ेगी।
कई दिग्गजों को जगह नहीं
गौरतलब है कि नई टीम में कलराज मिश्र, संतोष गंगवार और अशोक प्रधान जैसे दिग्गज अपनी जगह नहीं बना पाए। विनय कटियार जरूर केंद्रीय चुनाव समिति में जगह बनाने में कामयाब रहे, लेकिन इसके बदले उनकी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की कुर्सी की बलि चढ़ गई।
हां, वरुण के मुखर विरोधी माने जाने वाले मुख्तार अब्बास नकवी अपनी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की कुर्सी बचाने में कामयाब रहे, जबकि सतपाल मलिक इसी पद पर काबिज होने वाले राज्य का नया चेहरा बने। पार्टी सूत्रों के मुताबिक दरअसल वरुण को दिया गया महत्व लोकसभा चुनाव की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।
राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे कर हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर चुनावी वैतरणी में उतरने की योजना बनाई है तो उत्तर प्रदेश में पार्टी विशुद्ध रूप से हिंदुत्व के मुद्दे पर ही मैदान में उतरेगी।
इसके लिए पार्टी में वापस लौटीं उमा भारती, वरुण और मोदी की तिकड़ी को आगे कर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना है।
पार्टी आलाकमान नहीं चाहता कि इस रणनीति के सामने किसी तरह का अड़ंगा लगे, इसलिए टीम से बड़े दिग्गजों को किनारा करने से भी परहेज नहीं किया गया है।
हालांकि बीते लोकसभा चुनाव के दौरान एक धर्मविशेष के खिलाफ भड़काऊ भाषण के कारण चर्चित हुए वरुण को पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी अपनी टीम में लेना चाहते थे।
उनकी इच्छा तब उन्हें युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाने की थी। मगर तब वरुण इससे बड़ा ओहदा चाहते थे, इसलिए बात नहीं बनी।
वरुण राजनाथ के करीबियों में भी शुमार हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भड़काऊ भाषण मामले में जब वह जेल में बंद थे तब केंद्रीय नेता के रूप में अकेले राजनाथ ने ही उनसे मुलाकात की थी। राजनाथ से यही करीबी आज वरुण को इस मुकाम पर ले आई है।