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यूपी: कितना खोएगी-क्या पाएगी भाजपा?

Sat, 13 Sep 2014 02:21 PM IST
नवीन जोशी/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
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उत्तर प्रदेश 11 विधानसभा सहित कुल 33 विधानसभा सीटों और तीन लोकसभा सीटों के लिए मतदान हो रहा है।
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चुनाव प्रचार के अंतिम दिन आते-आते भाषणों से उन्माद फैलाने की इतनी कोशिशें की गईं कि चुनाव आयोग को भाजपा के ‘स्टार प्रचारक’ और सांसद योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाना पड़ा।

साफ है कि इन चुनावों में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा है क्योंकि 2012 के विधानसभा चुनाव में इनमें से 10 सीटें भाजपा और एक उसके सहयोगी अपना दल ने जीती थीं।
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लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में 71 सीटें जिताने का श्रेय जिन जनाब अमित शाह के हिस्से आया, वे आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

वर्ष 2017 में यूपी विजय का जो लक्ष्य उन्होंने तय किया है, इन उपचुनावों के नतीजे उसकी रणनीति को भी कसौटी पर कसेंगे। उत्तराखण्ड और बिहार के उपचुनावों के सनसनीखेज नतीजे हम देख चुके हैं। यूपी में किसी उपचुनाव ने शायद ही इतनी उत्तेजना और दिलचस्पी जगाई हो।

सपा की साख दांव पर

सतारूढ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद आम चुनावों की तरह सक्रिय रहे। एक-एक सीट की रणनीति उन्होंने बनाई।

आम तौर पर कोई मुख्यमंत्री उपचुनाव के लिए प्रचार नहीं करता, लेकिन अखिलेश यादव ने इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी।

उन्हें लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी पराजय के घावों पर मरहम लगाना है। यह साबित करना है कि ‘साम्प्रदायिक’ भाजपा को यूपी में टक्कर देने में अब भी सपा ही सक्षम है।

यूपी की सरकार कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बड़ी विफलता का दाग ढो रही है जिसे मिटाना है। उपलब्धियों के खाते में जमा आलोचनाओं का जवाब भी देना है।

भाजपा से ज़्यादा से ज़्यादा सीटें छीन कर ही यह सब किया जा सकता है। हालांकि इस समय यूपी के कुछ जिले बाढ़ और कुछ सूखे की चपेट में हैं और बेकाबू बिजली संकट ने भी सरकार का सिरदर्द बढ़ा रखा है।

दलित वोट बैंक बढ़ा रहा मुलायम की ‌मुश्किलें

उपचुनाव नहीं लड़ने की बहुजन समाज पार्टी की पुरानी नीति ने समाजवादी पार्टी की मुश्किलें बढ़ाई हैं, तो भाजपा इसमें अपना फायदा देखती है।

यह प्रश्न बड़ा मौजूं है कि बसपा प्रत्याशियों की अनुपस्थिति में उसका मूल दलित वोट किसके पक्ष में जाएगा?

लोकसभा चुनाव के नतीजे गवाह हैं कि तब उसे काफी दलित वोट मिले थे (बसपा एक भी सीट नहीं जीती थी)। इस बार जब वोटिंग मशीन में ‘हाथी’ निशान होगा ही नहीं तो क्या दलित वोटर ‘कमल’ को चुनेंगे?

‘साइकिल’ से तो उनकी पुरानी नाराज़गी है! शायद यही सोच कर मुलायम ने जिन सीटों पर भी सम्भव हुआ, बसपा से आए पुराने नेताओं को टिकट दिया है।

उधर, बसपा प्रमुख मायावती को भी यह आशंका सताती रही। इसलिए उन्होंने सभी 11 विधानसभा सीटों पर एक-एक निर्दलीय को बसपा का समर्थन देने का फैसला किया ताकि उनका वोटर भाजपा की तरफ न चला जाए।

इस पर संदेह ही है कि बसपा के नीले झण्डे और हाथी चुनाव निशान के बिना दलित वोटर निर्दलीयों को कितना स्वीकार करेगा। मतलब यह है कि दलित वोटर निर्णायक भूमिका में है।

भाजपा: क्या कुछ दांव पर

जैसा शुरू में कहा, ये उपचुनाव भाजपा के लिए यूपी में लोकसभा चुनाव से अर्जित लोकप्रियता और प्रतिष्ठा बचाने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

उसके पास खोने को सभी 11 सीटें हैं। पाने का अवसर सिर्फ मैनपुरी लोकसभा सीट पर है जो मुलायम परिवार का गढ़ है, इसीलिए भाजपा के लिए बहुत कठिन मोर्चा।

शायद इसीलिए अमित शाह ने यूपी में उपचुनाव जीतने के लिए केंद्र की अपनी (मोदी) सरकार के 100 दिनों की उपलब्धियों को प्रचार का आधार बनाने की बजाय उग्र हिंदुत्व और धार्मिक ध्रुवीकरण पर बहुत ज़्यादा जोर दिया।

भाजपा ने यूपी में पहली बार योगी आदित्यनाथ को स्टार प्रचारक बनाया, जिनके आक्रामक हिंदुत्व एजेण्डे के कारण ही उन्हें अब तक दूर-दूर ही रखा जाता था।

योगी को पार्टी ने प्रचार के लिए बाकायदा हेलिकॉप्टर से अधिकतम क्षेत्रों में भेजा। उन्होंने अपनी ख्याति के अनुरूप खूब भड़काऊ भाषण दिए।

लखनऊ में तो प्रतिबंध के बावजूद योगी ने सभा की और उत्तेजक भाषण दिया और मुकदमा होने की परवाह नहीं की। इसे भी चोला बदलती भाजपा का संकेत माना जा सकता है।

याद कीजिए कि यूपी में अमित शाह की देख-रेख में भाजपा ने लोक सभा चुनाव भी धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर ही लड़ा था।
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धार्मिक मुद्दों के दम पर भाजपा

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भाजपा नेताओं ने धार्मिक मुद्दों को खूब उछाला और जाट-मुस्लिम एकता में दरार पैदा करने में पूरी ताकत लगा दी थी।

खुद अमित शाह ने वहां बहुत भड़काऊ भाषण दिया था, जिसके लिए अब उनके खिलाफ आरोप पत्र दिया गया। नतीजे में भाजपा ने अप्रत्याशित विजय हासिल की।

ऐसा लगता है कि अमित शाह की भाजपा 2017 के लिए यूपी विजय की रणनीति इसी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर बना रही है और इन उपचुनावों को इसके इम्तिहान के तौर पर देख रही है।

नतीजे चाहे जो आएं, यूपी का सामाजिक ताना-बाना लगातार छलनी हो रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने ठीक ही चिंता व्यक्त की कि ऐसी साम्प्रदायिक उत्तेजना बाबरी मस्जिद ध्वंस के दौर की सिहरन पैदा करती है।
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