एक ओर जहां कोच्चि और जयपुर जैसे शहरों ने मेट्रो ट्रेन चलाने के रास्ते पर रफ्तार पकड़ ली है, वहीं उत्तर भारत के ज्यादातर बड़े शहर इस मामले में सोए हुए हैं।
यहां तक की मेट्रो परियोजनाओं के लिए मिल रही केंद्र की सहायता लेने में भी उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के शहरों ने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है।
चंडीगढ़ में जरूर मेट्रो को लेकर कोशिशें जारी हैं, जबकि लखनऊ ने अभी तक मेट्रो ट्रेन का खाका भी तैयार कर केंद्र को नहीं भेजा है।
मेट्रो ट्रेन चलाने के इच्छुक शहरों को केंद्र सरकार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए 50 फीसदी और फिजिबिलिटी रिपोर्ट बनाने के लिए 80 फीसदी वित्तीय सहायता देती है।
कई साल से चल रही इस योजना में आज तक उत्तर प्रदेश के किसी शहर ने मेट्रो बनाने की मदद नहीं मांगी।
शहरी विकास मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि लखनऊ मेट्रो के डीपीआर के लिए भी यूपी ने कोई मदद नहीं ली है।
इसी तरह पंजाब, जम्मू-कश्मीर और बिहार ने भी केंद्र की मदद से मेट्रो रेल की संभावनाएं तलाशना तक जरूरी नहीं समझा।
इस योजना का फायदा उठाकर 10 लाख से भी कम आबादी वाले गुवाहाटी नगर निगम ने मेट्रो रेल का खाका खींचना शुरू कर दिया है। दक्षिण भारत के कई शहर भी मेट्रो की तैयारियों में जुटे हैं।
बसों में भी यूपी की दिलचस्पी नहीं
उत्तर प्रदेश ने जेएनएनयूआरएम की बसें चलाने के मामले में भी खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। केंद्र के दबाव में शहरों ने कुछ बसें जरूर खरीदी लेकिन अपनी तरफ से पहल कर ज्यादा बसें यूपी के शहर नहीं ले पाए।
राज्य के कुल सात शहर जेएनएनयूआरमए में शामिल हैं जिनमें से कानपुर, आगरा और इलाहाबाद मेट्रो की तैयारी शुरू कर सकते हैं।
इसी तरह पंजाब में लुधियाना और अमृतसर की आबादी चंडीगढ़ से ज्यादा है। ये शहर भी केंद्र की मदद से मेट्रो की तैयारी में जुट सकते हैं।
7-8 करोड़ रुपये में बनता है डीपीआर
ट्रांसपोर्ट प्लानिंग के विशेषज्ञ प्रो. शिवानंद स्वामी के अनुसार, मेट्रो प्रोजेक्ट का डीपीआर बनाने में 7-8 करोड़ रुपये तक खर्च आ सकता है, जबकि फिजिबिलिटी रिपोर्ट इससे कम खर्च में बन जाती है।
मेट्रो रेल की योजना बनाने, फंडिंग की व्यवस्था और तकनीक प्लान बनने में कई साल लग जाते हैं। इसके बाद निर्माण में भी काफी समय लगता है। यानी शहरों को काफी पहले से तैयारी शुरू करनी होगी।