कर्नाटक की जीत से मदमस्त कांग्रेस अब लोकसभा चुनाव में हैट्रिक के सपने बुनने में जुट गई है।
मगर कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड के दफ्तर में आने वाले सालों में पार्टी की जीत और हार का गुणा भाग लगना शुरू हो गया है।
पूरे हिसाब किताब के बाद आने वाले साल पार्टी के लिए मुश्किल भरे माने जा रहे हैं।
दिल्ली, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इसी साल या फिर आगामी सालों में आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव का मामला हो हर जगह पार्टी का हाल बेहाल है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सामने भी अपना जलवा बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है। भ्रष्टाचार और महंगाई के तमाम थपेड़े और उतार चढ़ाव के बाद कर्नाटक की जीत से खुश कांग्रेस को इस साल दिल्ली में अपना किला बचाने की चुनौती से जूझना है।
पार्टी यहां शीला दीक्षित के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। लिहाजा, उनकी हर बात मानते हुए प्रदेश कांग्रेस को भी उन्हीं के हिसाब से चलाया जा रहा है। महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे ज्यादा दिल्ली में ही छाया रहा है। यहां पार्टी का संकट बड़ा है। मौजूदा राष्ट्रपति शासन के बाद झारखंड में कुछ महीनों में चुनाव हो सकते है।
पार्टी को वहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। मगर कमजोर संगठन के चलते अकेले बल पर सरकार बनाने का सपना पूरा होना मुश्किल है। आगामी सालों की चुनौतियों को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता पीसी चाको कहते है कि पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है।
राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी सारी मुश्किलों को पार कर लेगी। मध्य प्रदेश में पार्टी के पास बड़े नेताओं की फौज है। वहां के प्रदेश अध्यक्ष कांति लाल भूरिया को केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाव ही नहीं देते हैं।
यह बात प्रदेश प्रभारी महासचिव बी के हरिप्रसाद आलाकमान तक पहुंचा चुके है। मगर हुआ कुछ नहीं है। लिहाजा वहां भी पार्टी पर हार की हैट्रिक का खतरा है। छत्तीसगढ़ में भी गुटबाजी है। मगर आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद कुछ हालात सुधरे हैं।
खासकर पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की दादागिरी को रोकने के लिए वहां के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने कहा है कि प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया जाएगा। मगर फिर भी रमन सिंह सरकार की लोकप्रियता को थामना आसान नहीं लग रहा है।
राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार सत्ता विरोधी रुझान से जूझ रही है। पिछले छह महीनों में सरकार ने डैमेज कंट्रोल किया है। मगर भाजपा की वसुंधरा राजे काफी आक्रामक हैं। कांग्रेस वहां जातीय समीकरण बैठाने में जुटी है। कांग्रेस गहलोत के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी।
2014 में होने वाले आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी को अपना किला बचाने की मशक्कत करनी पड़ेगी। अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर कांग्रेस पहले ही घिर चुकी है। चाको का कहना है कि तेलंगाना का मुद्दा कांग्रेस के राष्ट्रीय एजेंडे में नहीं है। पार्टी के इस ढुलमुल स्टैंड से किरण रेड्डी सरकार को नुकसान होना तय माना जा रहा है। महाराष्ट्र में विपक्ष एकजुट नहीं है।
वहां शिवसेना, भाजपा और मनसे एक साथ आने में कतरा रहे है। जिसका फायदा सत्तारूढ़ कांग्रेस और राकांपा को हो सकता है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के सामने वहां सत्ता विरोध ज्वार है। साथी राकांपा भी कांग्रेस को कमजोर करने में जुटी हुई है।
वहीं हरियाणा में भले ही इनेलो के मुखिया ओमप्रकाश चौटाला जेल चले गए हों, मगर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए मैदान खाली नहीं माना जा रहा है। उनके पिछले लगभग तीन साल के कार्यकाल में हालात बदले है। किसान परेशान है और शहरी समस्याएं भी प्रदेश सरकार के खिलाफ बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।