प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह का फिर से ‘दोस्ती’ का प्रस्ताव लेफ्ट को मंजूर नहीं है।
इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए लेफ्ट ने साफ कर नीतियों में बदलाव किये बिना यूपीए से 2004 की तरह दोस्ती का रास्ता नहीं खुल सकता है।
लेफ्ट ने यह भी कहा है कि जिस कांग्रेस और यूपीए की नीतियों के खिलाफ वे सियासी जंग लड़ रहे हैं,अब उसी के साथ दोस्ती का सवाल ही पैदा नहीं होता है।
प्रधानमंत्री ने जापान यात्रा से लौटते वक्त लेफ्ट से दोबारा दोस्ती के मुद्दे पर कहा था कि राजनीति में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता है,लेकिन लेफ्ट इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर नहीं है।
लोकसभा में माकपा संसंदीयदल के नेता बसुदेव आचार्य ने कहा कि लेफ्ट ने 2004 में साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनने पर ही समर्थन दिया था, लेकिन जब कांग्रेस इस समझौते से पीछे हटी तो हमने अलग रास्ता पकड़ लिया।
तब से हम उनकी आर्थिक नीतियों के खिलाफ लड़ रहे हैं।
भाकपा सचिव अतुल कुमार अनजान ने भी कमोबेश यही बातें कहीं। उन्होंने कहा कि पीएम को यह बात तब याद नहीं आई जब 2007 में अमेरिका के साथ परमाणु करार के लिए सांसद खरीदे गये थे।
इस चार वर्षों में भी यह बात याद नहीं आई, लेकिन अब इतना तय है कि 2014 में यूपीए की सरकार नहीं बनेगी।
फारवर्ड ब्लॉक ने तो एक ऐसी शर्त भी सामने रख दी है जिसे यूपीए सरकार के लिए मानना आसान नहीं है।
पार्टी महासचिव देबब्रत बिश्वास ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया यदि अपनी आर्थिक नीतियां बदल देते हैं तो इस प्रस्ताव पर सोचा जा सकता है, हालांकि सरकार की तरफ से ऐसा बड़ा फैसला होने के कोई आसार नहीं हैं।
उन्होंने यूपीए को डूबता जहाज बताते हुए कहा कि उनके मुखिया आखिरकार जहाज को बचाने के लिए ऐसा कहेंगे ही। हालांकि आरएसपी ने कहा कि यह सब चुनाव के बाद देखा जाएगा।
पार्टी नेता अबनी राय ने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि लेफ्ट और ममता एक ही गठबंधन में रहे। पीएम ने इन दोनों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि चुनाव बाद की परिस्थिति को लेकर अभी से कुछ कहना उचित नहीं है।