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मंगल मिशन में यूपी का भी बड़ा योगदान

Thu, 25 Sep 2014 12:51 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, उझानी (बदायूं), परतावल, वाराणसी
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लाल ग्रह की कक्षा में मंगलयान के पहुंचने का जश्न जहां देश भर में मनाया जा रहा है, वहीं वैज्ञानिक सतपाल सिंह अरोरा उर्फ मिक्कू के घर में भी खुशियां कम नहीं हैं। मिक्कू मंगलयान से जुड़े अहम इंजन को बनाने वाली टीम के इंचार्ज हैं। नगर में स्टेशन रोड निवासी चरनजीत सिंह अरोरा की पांच संतानों में सबसे छोटे बेटे मिक्कू ने जब यह जानकारी अपने पिता को दी, तो वह खुशी से उछल पड़े। जानकारी मिलने पर उन्होंने बेटी और पुत्र वधू के साथ मुंह मीठा कर खुशियों को बांटा।
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मिक्कू तमिलनाडु की महेंद्रगिरि स्थित इसरो की यूनिट में उस टीम के प्रभारी रहे हैं, जिसने मंगलयान के दूसरे चरण के इंजन को तैयार किया है। इस पूरे मिशन में 200 वैज्ञानिक जुड़े और चार स्टेज पर भूमिका निभाई है। घरवालों को पिछले साल पांच नवंबर को भी अपार खुशी हुई थी, जब उन्होंने टीवी पर भारत को मंगल की ओर कदम बढ़ाते देखा था।

अभियान की सफलता के बाद मिक्कू ने बुधवार को सबसे पहले पिता को कॉल की। भाई अमरपाल सिंह रोंपी और अमृतसर में डॉक्टर भूपेंद्र सिंह से भी मिक्कू की बात हुई। भाभी रिम्मी और छोटी बहन जिम्मी ने मिक्कू को बधाई दी। रोंपी कहते हैं कि मिक्कू शुरू से ही मेधावी रहा है। पुरानी बात है, जब मिक्कू ने मां इंद्रजीत कौर से देश में नाम रोशन करने का वायदा किया था। दुर्भाग्य से इंद्रजीत अब इस जहां में नहीं हैं।
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कमलेंद्र कृष्ण त्रिपाठी ने निभाई अहम भूमिका

मिशन मंगलयान की कामयाबी में परतावल के रहने वाले कमलेंद्र कृष्ण त्रिपाठी ने भी अहम भूमिका निभाई है। वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में वैज्ञानिक हैं। इस मिशन की कामयाबी में क्षेत्र के योगदान की जानकारी से स्थानीय लोग गौरवान्वित हैं।

कमलेंद्र कृष्ण त्रिपाठी ने शुरुआती शिक्षा गोरखपुर में ग्रहण करने के बाद मथुरा से बीटेक किया और 2007 में बंगलूरू इसरो में जूनियर वैज्ञानिक के पद पर काम शुरू किया। समयबद्ध तरक्की पाकर वैज्ञानिक बने कमलेंद्र 400 वैज्ञानिकों के उस दल के सदस्य हैं, जिसने पांच नवंबर को 300 दिन के मंगलयान प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी।

अमर उजाला से फोन पर बातचीत में उन्होंने बताया कि 24 सितंबर तक यान को मंगल ग्रह पर पहुंचाने का लक्ष्य था। सभी वैज्ञानिक बंगलूरू के सेंटर में इसे लेकर अपनी-अपनी भूमिका में व्यस्त थे। क्रॉप कंट्रोलर की भूमिका में रहते हुए भी वह भी अपनी भूमिका को आगे बढ़ा रहे थे। बुधवार की सुबह मिशन मंगल की पूरी कामयाबी ने सभी में जोश भर दिया। उन्होंने बताया कि इससे जहां मंगल पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियों के अध्ययन में मदद मिलेगी, वहीं मीथेन गैस की खोज भी लक्ष्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सेंटर पर पहुंचकर पूरी टीम को बधाई दी।

किसान परिवार में हुई परवरिश
मूल रूप से परतावल बाजार निवासी कमलेंद्र कृष्ण त्रिपाठी के पिता हेमंत कृष्ण त्रिपाठी किसान हैं। कमलेंद्र के बड़े भाई शिवेंद्र दिल्ली में कंप्यूटर इंजीनियर हैं। दोनों भाइयों और बहन रश्मि और रागिनी को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने में वह पिता का बड़ा योगदान बताते हैं। उनकी पत्नी क्षमा प्राइवेट कंपनी में पीओ के पद पर हैं।

गोरखपुर में हुई शुरुआती शिक्षा
कमलेंद्र की पांचवी क्लास तक की पढ़ाई सरस्वती विद्या मंदिर गोरखपुर में हुई। कक्षा छह से दस तक वह गोरखपुर में एमपी इंटर कालेज के छात्र रहे और एमजी इंटर कालेज गोरखपुर से 12वीं करने के बाद मथुरा से बीटेक किया। इसके बाद 2007 में इसरो में बतौर जूनियर वैज्ञानिक के पद से करियर की शुरुआत की।
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मंगल मिशन में पूर्व बीएचयू छात्र भी

मंगलयान के मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचने से जहां पूरा देश खुश है वहीं बीएचयू के वैज्ञानिक भी खासा उत्साहित हैं। उनके उत्साह की वजह सिर्फ ये नहीं है कि इस सफलता से भारत ने एक नया इतिहास रच दिया है बल्कि वे इसलिए भी उत्साहित हैं कि इस मिशन से जुड़े डा. अनिल भारद्वाज बीएचयू के छात्र रहे हैं। वर्तमान में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के स्पेस फिजिक्स लैबोरेटरी के निदेशक डा. अनिल भारद्वाज ने वर्ष 2002 में आईआईटी बीएचयू (तब आईटी) सेएप्लाइड फिजिक्स में पीएचडी की थी।

उनके गहरे दोस्त भौतिकी विभाग के प्रो. अभय कुमार सिंह ने बताया कि मंगलवार को डा. अनिल भारद्वाज से उनकी बात हुई थी। उन्होंने जानकारी दी थी कि मंगलयान में पांच सेंसर लगे हुए हैं। एक सेंसर मंगल ग्रह पर मिथेन की खोज करेगा। दूसरा सेंसर सिमेटिक मैपर है, जो ग्रह पर मौजूद घाटी, पहाड़, पत्थर और गड्ढों आदि की मैपिंग करेगा। अन्य सेंसर वायुमंडल और वातावरण की जानकारी जुटाएंगे। उन्होंने बताया कि अगले चौबीस घंटे उनकी टीम के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। प्रो. सिंह ने बताया कि बुधवार को जब मंगलयान सफलतापूर्वक मंगल ग्रह में प्रवेश कर गया तो हमें बेहद खुशी हुई। अब तो इंतजार है कि सेंसर्स द्वारा मंगल ग्रह से डाटा, फोटो वगैरह प्राप्त हों। उन्होंने बताया कि अब तक मंगल पर 51 सैटेलाइट भेजे जा चुके हैं। भारत पहला ऐसा देश है, जिसका पहला ही मिशन सफल रहा। हमारा यह मिशन सबसे सस्ता भी है। इस मिशन से देश के प्रति व्यक्ति पर पांच रुपये का भार पड़ा है।

वहीं, आईआईटी बीएचयू के एप्लाइड फिजिक्स के वैज्ञानिक डा. अरविंद कुमार त्रिपाठी का कहना है कि हिंदू धर्म में मंगल पर जीवन होने की बात कही गई है। पुराणों में यह भी है कि मंगल से ही विस्थापित होकर मानव धरती पर आए थे। मंगलयान के सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में पहुंचने पर अब यह पता लगाया जा सकेगा कि वहां जीवन कब था? वहां आक्सीजन क्यों नहीं है?
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