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केजरी का दांव नाकाम, दिल्ली में लगेगा राष्ट्रपति शासन

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केंद्र सरकार ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार के इस्तीफे के बाद विधानसभा को निलंबित करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश पर मुहर लगा दी है।
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उपराज्यपाल नजीब जंग ने केंद्र सरकार से विधानसभा को निलंबित रखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी। जंग ने केजरीवाल की विधानसभा भंग करने की राय को खारिज करते हुए शनिवार दोपहर को अपनी सिफारिश गृहमंत्रालय को भेज दी थी।

उपराज्यपाल की सिफारिशों पर कानून मंत्रालय की राय लेने के बाद देर शाम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में उपराज्यपाल की सिफारिश पर मुहर लगा दी गई। कैबिनेट ने प्रस्ताव को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी के लिए भेज दिया है।
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लोकसभा के साथ नहीं होंगे विधानसभा चुनाव

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने और विधानसभा को निलंबन की अवस्था में रखने के केंद्र सरकार के फैसले से साफ हो गया है कि अब लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा के चुनाव नहीं कराए जाएंगे।

दिल्ली की राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में केंद्र के फैसले ने केजरीवाल के विधानसभा भंग कर लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्य में नए चुनाव कराने के सियासी दांव को नाकाम कर दिया है।

आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के आक्रामक सियासी तेवरों को देखते हुए ही गृह मंत्रालय ने उपराज्यपाल की सिफारिश को कैबिनेट में सीधे भेजने की बजाय पहले कानून मंत्रालय के पास भेजा।

कानून मंत्रालय की राय शुमारी के बाद देर शाम कैबिनेट की बैठक हुई और उपराज्यपाल की सिफारिशों पर मुहर लगा दी गई। इस तरह नजीब जंग से रिपोर्ट मिलने के महज सात घंटे के भीतर केंद्र ने राष्ट्रपति शासन के प्रस्ताव पर अपनी हामी भर दी।

कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं

उच्चपदस्थ सरकारी सूत्रों के मुताबिक राजनीतिक गणित को देखते हुए केंद्र फिलहाल दिल्ली विधानसभा को भंग करने के पक्ष में नहीं था। अगर विधानसभा को भंग किया जाता तो यहां दोबारा चुनाव कराना पड़ता।

केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट में जंग ने केजरीवाल की अगुवाई में दिल्ली के मंत्रियों की 70 सदस्यीय विधानसभा को भंग करने की सिफारिश को सिरे से खारिज कर दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक उपराज्यपाल निकट भविष्य में भाजपा, आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार बनाने की संभावना का विकल्प खुला रखना चाहते हैं।

जंग ने लिखा है कि फिलहाल कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। केजरीवाल ने उपराज्यपाल से विधानसभा को भंग करने की सिफारिश की थी।

एलजी संभालेंगे दिल्ली की बागडोर

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की केंद्रीय कैबिनेट की सिफारिश को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही सत्ता सीधे उपराज्यपाल नजीब जंग के हाथ में होगी। कैबिनेट मंत्री की जगह संबंधित विभागों के मुखिया की सिफारिश पर अंतिम मंजूरी मिलेगी। ऐसे में पब्लिक की दिक्कत बढ़नी तय है।

बेशक निलंबन की वजह से विधायक बने रहें और वेतन-भत्ते लेते रहें लेकिन इनका दबाव अधिकारियों पर नहीं चलेगा। अधिकारी जनता को आसानी से उपलब्ध भी नहीं होंगे।

राष्ट्रपति शासन के दौरान दिल्ली सचिवालय की गहमागहमी भी कम होगी और कई अधिकारी फिर इधर से उधर होंगे। विकास कार्यों की रुकी गति और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। क्योंकि अब संपर्क नेताओं से नहीं बल्कि नौकरशाहों से करना पड़ेगा, जो कि सभी के लिए आसान नहीं होगा।

मुख्यमंत्री अथवा मंत्री से मिलना आसान था। राष्ट्रपति शासन से भले ही कांग्रेस को राजनीतिक लाभ मिले, लेकिन जनता को रोजमर्रा की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ेगा।

चुनाव टालने की कोशिश में होता है निलंबन

उपराज्यपाल के पूर्व प्रधान सचिव आर चंद्रमोहन ने कहा कि विधानसभा का निलंबन चुनाव टालने की कोशिश होती है। ताकि कोई टूट फूट हो तो विधायकों की सदस्यता तब तक कायम रहे। हालांकि इसमें राजनीतिक फैसला भी जुड़ा होता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शासन की दशा में सरकार उपराज्यपाल चलाते हैं। दिल्ली में वर्तमान व्यवस्था भी कुछ इसी तरह की है। उपराज्यपाल के पास स्वीकृति लेनी होती है। राष्ट्रपति शासन लगता है तो 3 महीने में संसद को रिपोर्ट देकर उसे 6 महीने के लिए स्थिर करना होता है।
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अल्पमत सरकार का फैसला मानने की बाध्यता नहीं

लोकसभा व दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव, एसके शर्मा के मुताबिक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार अल्पमत सरकार थी। कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी।

शर्मा ने बताया कि ऐसे में उपराज्यपाल को इस कैबिनेट का फैसला मानने की बाध्यता नहीं थी। जिस सरकार के खिलाफ किसी मामले में 70 में से 42 विधायक चले जाएं, उसे सभी विधायकों के भविष्य का फैसला करने का अधिकार कैसे हो सकता है।
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