दो किशोरियों से गैंगरेप और फिर पेड़ से लटकाकर उनकी हत्या की सनसनीखेज वारदात से चर्चित हुए गांव कटरा सआदतगंज समेत पूरा इलाका तंबाकू उत्पादन के लिए मशहूर है।
मादक पदार्थ की फसल वाले गांव में कम उम्र के लड़के नशा करने और कमर में तमंचा लगाकर चलना स्टेट्स सिंबल समझते हैं। इलाकाई पुलिस से दोस्ती भी उनका शौक है। तंबाकू से शुरू हुई नशे की लत वक्त के साथ शराब तक पहुंच जाती है।
गांव में प्रवेश करते ही दलानों पर लगे टेढ़ी-मेढ़ी सूखी लकड़ियों के ढेर लोगों का ध्यान खींचते हैं। पूछने पर पता चलता है कि यह तंबाकू की फसल का एक हिस्सा है।
तंबाकू उगाते हैं 80 फीसदी किसान
कुछ लोग गर्व से बताते हैं कि अस्सी फीसदी किसान सैकड़ों बीघा जमीन में इस कैश क्रॉप का उत्पादन करते हैं। पहले बीज डालकर पौध तैयार की जाती है फिर क्यारियों में इसकी रोपाईं की जाती है।
दीवाली बाद पौध रौपी जाती है जो होली बाद कटती है। प्रति बीघा जमीन में तीन से चार क्विंटल तक तंबाकू होती है। मुख्य तंबाकू पत्तियों से निकलती है, जिसकी कीमत चार से पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल तक होती है।
लकड़ियों की पिसाई करके इन्हें भी तंबाकू के दूसरे उत्पाद बनाने में उपयोग किया जाता है। फसल से किसानों को दस से पंद्रह हजार रुपये बीघा की आमदनी होती है। इतनी गेहूं, गन्ना, आलू, लहसुन या मेंथा से नहीं हो पाती है।
पढ़कर नहीं, खरीदकर हासिल की जाती है मार्कशीट
इलाके भर में अशिक्षा ही अपराध की जननी साबित हो रही है। गांव में प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल हैं। इसके अलावा दो-तीन निजी स्कूल हैं। इनके पास पांचवीं और आठवीं तक की अस्थायी मान्यता तो है लेकिन पड़ोसी जिला शाहजहांपुर के बदनाम परीक्षा केंद्रों से इनकी साठगांठ है।
ऐसे में बिना किसी तरह की पढ़ाई के यह विद्यालय यूपी बोर्ड से हाईस्कूल और इंटर कराने का ठेका ले लेते हैं। हाईस्कूल कराने का ठेका चार हजार रुपये और इंटर का पांच हजार रुपये में होता है। इसमें रेग्यूलर एडमिशन की बोर्ड फार्म फीस के अलावा सेंटर पर नकल कराने की फीस भी शामिल रहती है। स्कूल प्रबंधन ही फार्म भरने से लेकर तमाम औपचारिकता पूरी करते हैं।
पूरे वर्ष कॉलेज न जाने की छूट होती है। केवल परीक्षा के दिनों में जाना पड़ता है। प्रवेशपत्र देते समय कुछ रुपए लिए जाते हैं। कभी कभार केंद्र में सख्ती पर नकल की फीस अलग से देनी पड़ती है।
गांव के 70 फीसदी युवा तंबाकू की चपेट में
तंबाकू बिक्री के लिए पड़ोस का कस्बा कायमगंज (फर्रुखाबाद) पश्चिमी उप्र की बड़ी मंडी है। अब तो गांव से कायमगंज के बीच अटैना गंगा ब्रिज भी बन गया है जिससे खेती को और बढ़ावा मिलेगा।
लोग बताते हैं कि लकड़ा और काला भूत नस्ल की अच्छी तंबाकू यहां होती है, जिसकी मार्केट में बड़ी डिमांड है। कायमगंज के व्यापारियों से सिगरेट और गुटका कंपनियां इसे हाथों-हाथ ले जाती हैं।
दूसरी ओर गांव के कुछ बुजुर्ग संपन्नता की इस खेती को अच्छा नहीं मानते। मेडिकल स्टोर चलाने वाले रामदास कश्यप कहते हैं कि तंबाकू की खेती से नई पीढ़ी में सांस संबंधी दिक्कतें बढ़ रही हैं।
हालांकि इनका आंकड़ा कम ही है। बावजूद तंबाकू और बीड़ी के प्रति लड़कों का लोभ कम नहीं हो पाता। गांव में 13 से 21 वर्ष के लड़कों की आबादी तकरीबन एक हजार है। इनमें से 70 फीसदी किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन कर रहे हैं।
धौंस जमाने के लिए अपराधियों से दोस्ती
वह अशिक्षा को यहां पनप रही बुराई की जड़ मानते हैं। तंबाकू की खेती करने वाले बुजुर्ग रामभरोसे लाल तंबाकू से बीमारी की बात तो नकारते हैं पर यह जरूर कहते हैं कि इतना लाभ देने वाली दूसरी फसल मिल जाए तो पूरा गांव तंबाकू की खेती छोड़ दे।
रामभरोसे इस बात से दुखी हैं कि कम उम्र के लड़के तमंचा अंटी (कमर) में लगाकर चलते हैं। वह अपनी धौंस जमाने के लिए अपराधियों से दोस्ती करने से भी नहीं कतराते। चौकी के सिपाहियों की खातिरदारी करके उन्हें अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं। कहते हैं कि ऐसा नहीं होता तो दो बेटियों के खून के छींटे खाकी पर काहे पड़ते।