एक आरटीआई आवेदनकर्ता से 10 रुपये की शुल्क वसूलने के लिए राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने 30,000 रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए। केंद्रीय सूचना आयोग ने इस मामले में कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह ‘मोहर लुटा जाए, कोयले पर छाप पड़े’ जैसा मामला है।
सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने अपने आदेश में कहा कि ‘एक दस रुपये के आईपीओ की सूचना न देने पर लड़ी गई कानूनी लड़ाई के लिए 30,000 रुपये खर्च करने की कहानी सुनने के बाद यह ‘मोहर लुटा जाए, कोयले पर छाप पड़े’ जैसा मुहावरा प्रतीत होता है। अगर इसे फिर से लिखा जाए तो कहा जाएगा ‘हजारों लुटा जाए, रुपये पर छाप पड़े।’
इस मामले में आवेदक ने कोर्ट फीस स्टैंप के रूप में दस रुपये का शुल्क चुकाया था, जिसके बारे में एनजीटी ने कहा था कि इसे उनके आफिस द्वारा जारी नहीं किया जा सकता।
आवेदक के चुकाने के बाद भी एनजीटी को होता घाटा
इसके बाद एनजीटी आफिस ने आवेदक को आईपीओ अथवा डिमांड ड्राफ्ट की शक्ल में 10 रुपये की शुल्क चुकाने को पत्र लिखा। आवेदक को एनजीटी की ओर से यह भी कहा गया कि वह उनके आफिस से सूचना प्राप्त कर सकता है।
सुनवाई के दौरान यह बात निकलकर आई कि न तो पत्र की प्रति और न ही डिस्पैच का साक्ष्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया। जब आचार्युलु ने एनजीटी के वकील से पूछा क्या 10 रुपये के लिए पत्र लिखने पर 50 रुपये खर्च हुए तो इस पर उनका जवाब ‘हां’ में था।
आचार्युलु ने कहा, ‘अगर आवेदक मांगे गए 10 रुपये के आईपीओ/डीडी चुका देता तो एनजीटी उसे सूचना वापस भेजने पर 50 रुपये खर्च करता। अगर आवेदक 10 रुपये चुका देता तब भी एनजीटी को 40 रुपये का घाटा होता।
31 हजार महीने का खर्च वकील पर
अगर सूचना डिस्पैच की जाती तो इसकी कीमत 100 रुपये तक होती।’ उन्होंने कहा,
‘इसी आधार पर वकील को प्रतिमाह 31,000 रुपये दिए जा रहे हैं।
इसके
अतिरिक्त कांफ्रेंस कनवेंस के लिए 700 रुपये, पहली अपील के लिए 11,000
रुपये, दूसरी अपील के लिए 21,000 रुपये तथा अन्य खर्चों के अतिरिक्त दस
प्रतिशत क्लर्क चार्ज शामिल है।