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भारतीय फौज की शान है ये विशेष दस्ता, जिसने म्यांमार में किया कमाल

Thu, 11 Jun 2015 06:09 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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मणिपुर के चंदेल में 4 को भारतीय सेना के 18 जवानों की शहादत का बदला सेना के इलीट कमांडोज ने लिया। इनकी टुकड़ी का नाम है 21 एसएफ (स्पेशल फोर्स)। इन्हें इलीट कमांडो कहा जाता है क्योंकि ये बाकी जवानों से बहुत अलग होते हैं।
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एक सामान्य जवान को स्पेशल फोर्स का कमांडो बनने के लिए कड़ी मेहनत करनी होती है। स्पेशल फोर्सेज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनके अधिकतर ऑपरेशन दुर्गम स्थानों पर ही होते हैं।

स्पेशल फोर्स के जवानों की ट्रेनिंग हिमाचल प्रदेश स्थित स्पेशल फोर्स ट्रेनिंग स्कूल में होती है। 21 स्पेशल फोर्स की बटालियन को लड़ने की नई तकनीक सीखने के साथ-साथ उसकी आदत भी डाल लेनी होती है क्योंकि यह उनके जीवन का एक अभिन्न अंग हो जाता है।
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इलीट फोर्स का हैं हिस्सा

सेना के विशेष दस्तों में शामिल होने वाले जवानों को देशी माड्यूल के साथ ही मिजोरम में स्थित वारफेयर स्कूल में ट्रेनिंग लेनी होती है। सेना के हर विशेष दस्ते की तरह ये दस्ता भी विमान से कूदने में निपुण होता है।

वैसे तो ये अपनी जंग आसमान से जमीन तक लड़ते हैं लेकिन उन्हें जमीन पर भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। 21 पैरा स्पेशल फोर्स भारतीय सेना के इलीट स्पेशल फोर्स का हिस्सा होती है।

इस यूनिट की शुरुआत मराठा लाइट इन्फैन्ट्री से हुई थी। 1995 में ये फोर्स पैराशूट बटालियन में तब्दील हो गई। 1996 में इन्हें औपचारिक रुप से शामिल कर लिया गया और कर्नल वीबी शिंदे इस यूनिट के पहले कमांडिंग ऑफिसर थे।

ये हैं इनके हथियार

स्पेशल फोर्स की यूनिट घने जंगलों में होने वाले वारफेयर से निपटने में सक्षम होती हैं। ये प्रायः पूर्वोत्तर सीमा में तैनात किए जाते हैं विद्रोहियों से अशांति की आशंका होती है।

2006 में आपरेशन राइनो में श्‍ाानदार प्रदर्शन के लिए 21 स्पेशल फोर्स को आर्मी स्टाफ के यूनिट चीफ से प्रशंसा पत्र भी मिल चुका है। सेना की इस इकाई को कई गैलेंट्री एवार्ड भी मिल चुके हैं, जिनमें कीर्ति, शौर्य चक्र और विशिष्ट सेवा पदक जैसे अवार्ड शामिल हैं।

किसी भी स्थिति से निपटने के लिए कमांडो हर वक्त अपने हथियार से लैस रहता है। 21 एसएफ के एक कमांडो के पास 7.62 मिलीमीटर गैलिल स्नाइपर रायफल, ऑटोमेटिक स्नाइपर राइफल, एम-4 कारबाइन, 179 मिलीमीटर पिस्टल सहित अन्य हथियार इनका हिस्सा होते हैं।
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करते हैं कड़ी मेहनत

स्पेशल फोर्स प्रायः ऐसे ही ऑपरेशन का हिस्सा होते हैं जैसा कि अभी उन्होंने म्यांमार में किया। इन्हें ऑपरेशन के दौरान हेलिकॉप्टर से ही पहुंचाया जाता है। इसके लिए ये सेना के एविएशन हेलिकाप्टर का उपयोग करते हैं।

स्पेशल फोर्स का एक जवान अपने साथ 60 किलोग्राम तक वजन का हथियार लेकर चलता है। स्पेशल फोर्स के एक जवान को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वो किसी भी दशा में जंग की दिशा बदल सके जिसके लिए जवान कड़ी मेहनत करता है।
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