हिंदी भाषी क्षेत्र के चार राज्यों में से दो—राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा की पहले से कहीं बेहतर विजय तथा दो राज्यों—दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ में संघर्षपूर्ण जीत से एक बात तो साफ है कि देश भर में यूपीए सरकार के विरुद्ध जिस माहौल की चर्चा होती रही है, अब अपना असर दिखा रहा है।
यह आश्चर्य की बात है कि राजस्थान में अशोक गहलोत और दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार को सत्ता विरोधी जिस लहर ने डुबोया, वह मध्य प्रदेश में तो बिल्कुल भी कारगर नहीं रही। उलटे शिवराज सिंह के समर्थन में सत्ता-समर्थक लहर ने भाजपा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
छत्तीसगढ़ में बेशक डॉ. रमन सिंह की अगुवाई वाली सरकार को कांग्रेस से एक-एक सीट के लिए जूझना पड़ा, लेकिन आखिरकार रमन सिंह की साफ-सुथरी छवि उनके मंत्रियों-विधायकों के लिए लोगों की नाराजगी पर भारी पड़ती दिखी।
दोनों मुख्यमंत्रियों के कामकाज तथा छवि के अलावा जो एक बड़ा तथ्य भाजपा के पक्ष में था, वह है, पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का करिश्मा, जिसके दर्शन उनकी सभाओं में उमड़ी, खासतौर से युवाओं की भीड़ से हुए।
मध्य प्रदेश में जहां मोदी का प्रचार भाजपा की जीत के अंतर और आंकड़े में इजाफा करने वाला तत्व साबित हुआ, वहीं छत्तीसगढ़ में इसने भाजपा को वह संबल दिया, जिसकी जरूरत कांग्रेस के आक्रामक अभियान तथा सत्ता-विरोधी माहौल से जूझने के लिए रमन सिंह को थी।
भाजपा के खिलाफ नहीं था कोई बड़ा मुद्दा
यह विडंबना ही है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा ने मोदी के राष्ट्रीय असर को देर से आंका। वह भी तब जबकि टिकट बंटवारे को लेकर उपजे असंतोष, दरभा घाटी में नक्सली हमले के बाद कांग्रेस को मिल रही सहानुभूति, कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप और अनेक भाजपा विधायकों के विरुद्ध कमतर प्रदर्शन की तोहमतों से पार्टी हलकान थी।
छत्तीसगढ़ में इन कारकों के अलावा कोई बड़ा मुद्दा भाजपा सरकार के खिलाफ नहीं था। पार्टी दस साल की अपनी उपलब्धियों के बूते ही तीसरी बार सत्ता में वापसी आसानी से कर सकती थी। शायद यही सोचकर पार्टी ने चुनाव अभियान रमन सिंह की छवि पर केंद्रित रखा। लेकिन यही काफी नहीं था, बल्कि इसका विपरीत असर भी हुआ। इसीलिए दूसरे दौर के अभियान में मोदी की ज्यादा सभाएं रखनी पड़ीं।
छत्तीसगढ़ में राहुल की रणनीति रही सफल
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की चुनावी योजना और कहीं चली हो या नहीं, छत्तीसगढ़ में बेशक उनका दखल कांग्रेस के लिए लाभकर साबित होता दिखा। नए चेहरे उतारने के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की राज्य के दूसरे कांग्रेस नेताओं से भिड़ंत रोकने में राहुल का दखल काम आया।
हालांकि कुछ प्रमुख कांग्रेस नेताओं के कड़े संघर्ष में फंसने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चरणदास महंत ने जिस तरह पार्टी में भितरघात को दोष दिया उससे संकेत मिलता है कि जोगी पार्टी में अपने विरोधी नेताओं को ठिकाने लगाने के खेल से बाज नहीं आए। ऐसा न होता, तो शायद कांग्रेस सत्ता में लौट भी आती।
शिवराज सिंह पर साधे व्यक्तिगत निशाने
मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता आखिर तक एकजुट नहीं हो सके। आम धारणा है कि कांग्रेस अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया को पहले से आगे करती, तो पार्टी को फायदा होता। लेकिन अपनी जन-आशीर्वाद यात्रा में राज्य के सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों में जीवंत जनसंपर्क कर आए शिवराज सिंह की आम लोगों तक सीधी पहुंच बनाने वाली सामान्य कार्यकर्ता की छवि उन पर भारी थी।
कांग्रेस ने अपने हवाई आरोपपत्र के जरिये जिस तरह शिवराज सिंह पर व्यक्तिगत निशाने साधे, उससे कांग्रेस को नुकसान ही हुआ। अच्छी छवि के जनप्रिय नेता को उसकी प्रशासनिक नाकामियों के लिए तो घेरा जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत आरोप लगाकर नहीं।
अंसतोष से पार पाने में सफल रही भाजपा
इसके अलावा शिवराज सिंह सरकार ने समाज के हर वर्ग के लिए जो अनेकानेक योजनाएं लागू कीं, उन पर ठीक से अमल पक्का करने में उनकी सरकार काफी कामयाब रही। इसका सम्मिश्रित असर यह हुआ कि भाजपा टिकट बंटवारे में उभरे जबरदस्त असंतोष से लेकर मंत्रियों के विरुद्ध नाराजगी और उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में जातियों के अभाव तक से पार पाने में सफल रही।
लेकिन हिंदी पट्टी के चारों राज्यों से जो संदेश उभरा है, वह यही है कि भाजपा अपने मजबूत, स्वच्छ छवि वाले और कार्यक्षम नेताओं को आगे कर देश में यूपीए सरकार विरोधी माहौल का सबसे अधिक लाभ उठा रही है।