बेंसुरा नदी के किनारे बसा है महाराष्ट्र का बीड जिला। इसके गाँव येल्दा तक जाते हुए प्रकृति मानो हर जगह आपका स्वागत करती दिखती है। पर ये भ्रम देर तक पाले रखना ठीक नहीं। यह आजाद भारत का वह गाँव है, जिसकी तीन-चौथाई आबादी हर साल बंधुआ मजदूर की तरह प्रवास करती है।
इनकी जमानत जमीन नहीं, एडवांस होता है, जिसके नाम पर वो खुद को बेच देते हैं। येल्दा तक पहुँचते-पहुँचते आपकी आँखों पर पडा पर्दा हटने लगता है। सूखे से पीडित इस गाँव में घुसते ही तब तस्वीर और साफ हो जाती है जब आप तुकाराम भिंबराव कांबले से मिलते हैं।
तुकाराम इस गाँव का वो शख्स हैं जो हर साल छह-सात महीने अपनी पत्नी के साथ कर्नाटक जाते हैं। दोनों को कंपनी अगले साल के लिए करीब 60 से 70 हजार रुपए एडवांस दे देती है।
छलक पड़ा गुस्सा
यह पैसा इस बात का वादा है कि वो अगले साल कंपनी के कारखाने में काम करने
जरूर पहुँचेंगे। गाँव के दिगंबर चव्हाण के जरिए मैंने जाना कि तुकाराम और
उनकी पत्नी असल में कुछ कंपनियों के बंधुआ बन चुके हैं।
दो साल से पड रहे
सूखे ने इन किसानों की कपास, सोयाबीन और ज्वार की खेती मार दी है। अब वो
दूसरों के कारखानों और खेतों के मजदूर हैं। जैसे ही मैंने तुकाराम से पूछा
कि वो काम करने बाहर क्यों जाते हैं, उनका गुस्सा छलक पडा।
''हमें काम
मिलता नहीं, पेट भरता नहीं। बाल बच्चों को कैसे पालें। गन्ना तोडने के
लिए बाहर जाना पडता है। कर्नाटक जाते हैं। शोलापुर जाते हैं। गाँव में
आने के बाद कोई काम नहीं मिलता। पानी पीने को मिलता नहीं। तालाब है पर
पानी नहीं है।''
दीवाली के बाद सूना हो जाएगा गांव
तुकाराम 55 साल के हैं और पिछले 30 साल से यहीं बंधुआ
मजदूरी कर रहे हैं। उनके बच्चे भी उनके साथ ही हर साल प्रवासी मजदूर बनते
हैं क्योंकि पीछे गाँव में उन्हें देखने वाला कोई नहीं। तुकाराम की पत्नी
गंगूबाई तुकाराम कांबले ने बताया, ''20 साल से इनके (पति के) साथ जा रही
हूँ बाहर काम करने। गाँव में धंधा है नहीं। खेती खराब हो चुकी है। कमाई
पूरी नहीं पडती। बाल बच्चों को पालने के वास्ते जाते हैं। अगर कोई बुजुर्ग
होता है, तो ही उन्हें घर में छोडते हैं। नहीं तो किसके पास छोडें।''
यही
हाल गाँव के शारीरिक रूप से काम करने लायक करीब 75 फीसदी मर्दों का है। यह
बंधुआ प्रवास दीवाली के बाद शुरू होता है और इसके बाद एडवांस के साथ
इन्हें अगले साल जून में छुटकारा मिलता है। फिर से एक दुष्चक्र शुरू हो
जाता है।
येल्दा में गन्ने और ज्वार की जो खेती थी पिछले दो साल में बारिश न
होने से बर्बाद हो चुकी है। गाँव में दो तालाब हैं। हमारे पहुँचने से दो
दिन पहले हुई बूंदाबांदी के बाद वहां नमी दिख रही थी, पर असल में ये नमी
जानवरों की प्यास बुझाने के काबिल भी नहीं। फिलहाल पानी के लिए दो किलोमीटर
तक गाँव पैदल चलता है।
मगर दीवाली के बाद वो सूना हो जाएगा। पीछे रह
जाएंगे कुछ बुजुर्ग जो अपने खेतों की प्यासी जमीन पर बैठकर आसमान ताकेंगे।