आडवाणी का इशारा वन मैन रूल की ओर था, जो एक तरह से सही ही है। सत्ता की सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटकर नहीं रह जानी चाहिए। इसी से आपातकाल जैसी परिस्थितियां बनती हैं। हालांकि मौजूदा दौर में संवैधानिक तौर पर तो उसकी गुंजाइश नामुमकिन है।
आपातकाल देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक काले धब्बे की तरह है। जिसका भूत कांग्रेस और उसके नेताओं का आने वाले सालों में भी कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। आज नहीं तो कल कांग्रेस के नेताओं को इसका जवाब तो देना ही होगा। वे इससे बचकर नहीं जा सकते। समय उनसे कुरेदने वाले सवाल पूछेगा।
जब-जब इस काले दिन को याद किया जाएगा, लोकतंत्र इसका हिसाब तो मांगेगा ही। यह पूछा जाएगा आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी, जो लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख देने वाले आपातकाल को लगाना पड़ा।
आपातकाल के बाद गठित हुए शाह आयोग ने भी माना है कि न तो खुफिया एजेंसियों ने चेताया था और न ही कहीं और से कोई ऐसी खुफिया रिपोर्ट थी कि देश को अस्थिर करने के लिए कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में इंदिरा गांधी ने मनमाने तरीके से आपातकाल लगा दिया। उनके बेटे संजय गांधी के हाथों में इस तरह के फैसलों की बागडोर थी।
जितने भी दमनकारी उपाय हो सकते थे, इंदिरा और उनके बेटे संजय ने किए। मगर, वे शायद यह भूल गई थीं कि लोकतंत्र की कमान जनता के हाथों में होती है और उसका फैसला अंतिम होता है। आज लालकृष्ण आडवाणी ने जिस तरह से आपातकाल के बारे में अपने एक इंटरव्यू में कहा, वह दरअसल ‘वन मैन रूल’ की ओर इशारा करता है।
वह भले ही अपने बयान से मुकर गए हों या फिर मुकरना उनकी कोई मजबूरी रही हो, मगर यह तो सही है कि सत्ता की शक्तियां किसी एक के हाथ में सिमटने से ही आपातकाल जैसी परिस्थितियां बनती हैं।