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पढिए, इनके उत्थान और पतन की दास्तां

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वर्ष 2013 को भ्रष्ट व्यवस्था और समाज के रसूखदार लोगों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाना जाएगा।
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अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू किए गए आंदोलन को दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप के शानदार प्रदर्शन में बदला, तो अशोक खेमका और दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे नौकरशाहों ने बड़े लोगों के खिलाफ मोर्चा लिया।

आसाराम, तरुण तेजपाल और अशोक कुमार गांगुली के चेहरों से भी इस साल लोगों ने नकाब उतारे।
आगे पढ़िए इस साल के उत्थान और पतन की दास्तां...

अरविंद केजरीवाल

एक साल पहले झोला वाले अरविंद केजरीवाल ने जब झाड़ू उठाने का फैसला किया था, तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि सियासत के बड़-बड़े सूरमाओं की सामत आने वाली है। दिल्ली विधानसभा के नतीजों ने जता दिया कि स्वच्छ लोग सामने आएं तो तस्वीर बदल सकती है।

भारतीय राजनीति के इस एंग्री यंगमैन का कहना है कि वह राजनीति करने नहीं, बल्कि राजनीति बदलने आएं है। शीला दीक्षित को 25 हजार से ज्यादा वोटों से पटखनी देकर उन्होंने साबित कर दिया जोखिम उठाने वाले ही इतिहास रचते है।

लेकिन इस एके 46 यानी 46 साल के अरविंद केजरीवाल का असली इम्तहान दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद होगा। उनके सामने चुनौतियां आपार हैं, दिल्ली की जनता को ढ़ेरों उम्मीदें हैं और कांग्रेस व भाजपा उनकी चूक का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठी है।

एडवर्ड स्नोडेन

दुनिया में ऐसे कितने लोग होंगे, जो दो लाख अमेरिकी डॉलर के वेतन और हवाई में आलीशान मकान छोड़कर कांटों भरा रास्ता चुनेंगे।

लेकिन स्‍नोडन ने ऐसा किया। सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) में तकनीक सहायक रह चुके स्‍नोडेन ने नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एनएसए) की निगरानी परियोजना की सच्चाई सामने लाकर दुनिया में लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार होने का दावा करने वाले अमेरिका की पोल खोल दी।

इस जीनियस ने खुफिया जानकारियां देने में ′वेरेक्स′ कोड का सहारा लिया, जिसका लैटिन में मतलब होता है, ′′सच बयां करने वाला।′′

नरेंद्र मोदी

भाजपा के नए पीएम इन वेटिंग, नए पोस्टर बॉय, नए लौह पुरुष और नए खेवनहार मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। पर, विरोधी उन्हें हिटलर, मुसोलिनी, तानाशाह, मौत का सौदागर, फेंकू और न जाने किन-किन उपाधियों से नवाजते हैं।

कॉरपोरेट जगत उनका मुरीद है और एक बड़े तबके को लग रहा है कि सख्त फैसले लेने के लिए मशहूर मोदी ही बदहाल अर्थव्यवस्था को उबार सकते हैं। मोदी की शख्सियत कुछ ऐसी है कि चाहने वाले उन्हें अपने दिल में जगह देते हैं, तो नफरत करने वाले अपने दिमाग में।

राहुल गांधी

लगभग दस वर्षों से राजनीति में सक्रिय राहुल गांधी ने देर से ही सही, लेकिन इस साल कुछ सही कदम उठाए। दागी नेताओं को बचाने वाला अध्यादेश फाड़कर और लोकपाल को संसद से पारित कराने में सक्रियता दिखाकर उन्होंने कुछ उम्मीदें जगाई हैं।

लेकिन देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का मूल चरित्र वह बदल पाएंगे, इसमें संदेह है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष ने सरकार में कोई जिम्मेदारी लेने से अभी तक इन्कार किया है, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी उन्हें ही नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा करने जा रही है।

अरुंधति भट्टाचार्य

महिला बैंकरों की सूची में अरुंधति भट्टाचार्य का नाम शामिल होना खास इसलिए है, क्योंकि वह 207 वर्ष पुराने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष बनी हैं।

एसबीआई जेनरल इंश्योरेंस, मोबाइल बैंकिंग जैसी योजनाओं को साकार करने में हाथ बंटाने वाली अरुंधति रिटेल, कॉरपोरेट फाइनेंस और ट्रेजरी जैसे विषयों में दक्ष मानी जाती हैं।

अपने सहकर्मियों की नजर में वह ऐसी अधिकारी हैं, जो बैंक की नब्ज पहचानती हैं, लेकिन खुद अरुंधति की मानें, तो बैड लोन में कमी लाने जैसे मोर्चों पर लड़कर उन्हें अब भी काफी कुछ सीखना है।

रघुराम राजन

2005 में ही उन्होंने कह दिया था कि पूरी दुनिया पर गंभीर आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे हैं। उस वक्‍त अर्थशास्‍त्र के तमाम दिग्गजों ने एक सुर में उनकी आलोचना की थी।

लेकिन इतिहास गवाह है कि 2008 की वैश्विक मंदी के बाद जिस अर्थशास्‍त्री से बात करने के लिए पूरी दुनिया का मीडिया उतावला हो रहा था, वह रघुराम जी. राजन ही थे।

रघुराम न केवल भारतीय रिजर्व बैंक के दूसरे सबसे युवा गवर्नर बने हैं, बल्कि उन्हें समकालीन अर्थशास्त्रियों में सबसे ज्यादा प्रभावशाली माना जाता है। देखना यह है कि खस्ताहाल अर्थव्यवस्‍था पर वह किस तरह मरहम लगाएंगे।

दुर्गा शक्ति नागपाल

ग्रेटर नोएडा में यमुना नदी की तलहटी में चलने वाले रेत खनन के काले कारोबार को रोकने की ′हिम्मत′ न तो गांव वालों में थी, और न ही स्थानीय निकायों में।

लेकिन 2009 बैच की आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल ने इसे रोकने का साहस दिखाया। हालांकि इसकी उन्हें ′कीमत′ भी चुकानी पड़ी और निलंबन का दंश झेलना पड़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के निलंबन के खिलाफ पूरा देश एकजुट हो गया।

फिलहाल कानपुर देहात में अपनी सेवा दे रहीं नागपाल बतौर प्रशिक्षु आईएएस मोहाली में भी भूमि घोटाले का पर्दाफाश कर चुकी हैं।

अशोक खेमका

सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के जमीन संबंधी सौदों पर सवाल उठाकर सुर्खियों में आने वाले 1991 बैच के आईएएस अशोक खेमका की छवि एक ऐसे निडर अधिकारी की है, जो व्यवस्था के अंदर रहकर उसे ठीक करने की जद्दोजहद में है।

अब तक 46 तबादले झेल चुके खेमका को आप ने हरियाणा में पार्टी की अगुवाई करने का न्योता दिया है। अब देखना है कि हरियाणा में हुड्डा की कुर्सी हिलाने के लिए वह चुनावी समर में उतरेंगे या फिर मौजूदा भूमिका में ही भ्रष्ट व्यवस्था की सफाई के लिए झाड़ू चलाते रहेंगे?

शी जिनपिंग

एक दशक बाद इस वर्ष चीन में जब सत्ता परिवर्तन हुआ, तो ‘प्रगति का प्रतीक’ बन चुके हू जिंताओ की सियासी पारी का अंत तो हो गया, लेकिन सबसे ताकतवर शख्सियत के रूप में उभरने वाले नेता शी जिनपिंग थे।

चीन का यह नया राष्ट्रपति ′चाइनीज ड्रीम′ को लेकर भी आम-ओ-खास में प्रसिद्ध है, जिसमें हर चीनी नागरिक से आत्मसुधार की अपील की गई है। हालांकि जिनपिंग का खुद का सपना चीन को एकजुट रखकर उसे आर्थिक मोर्चे पर शीर्ष पर पहुंचाना है, जिस पर फिलहाल अमेरिका का कब्जा है।

तरुण तेजपाल

अंतरराष्ट्रीय ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने कभी तेजपाल की तारीफ ऐसे शख्स के रूप में की थी, जिसने स्टिंग ऑपरेशन के जरिये भारतीय मीडिया का चरित्र बदला। वाकई ऑपरेशन वेस्ट इंड जैसे स्टिंग ने सफेदपोश भारतीय राजनेताओं को बेनकाब किया था।

लेकिन दूसरों की खोज-खबर लेने वाला यह पत्रकार अपने चरित्र पर लगे यौन-शोषण के दाग के कारण खुद सवालों के घेरे में है।

तहलका का यह पूर्व प्रमुख मैन एशियन लिटरेरी पुरस्कार में लांगलिस्टेड हो चुका है और अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवियों में भी गिना जाता है।

लालू प्रसाद यादव

1970 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव पटना विश्वविद्यालय के महासचिव पद पर काबिज हुए, थे, तो उसे छात्र राजनीति आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ माना गया।

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले लालू सामाजिक बदलाव की बुनियाद रखने जा रहे थे। पर बाद के दिनों में वह परिवारवाद और आर्थिक घोटाले के कारण ही ज्यादा जाने गए।

उम्र का सातवां दशक पूरा करने जा रहे लालू यादव का चारा घोटाले में दोषी साबित होना और लोकसभा की सदस्यता गंवाना भी भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
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जगन रेड्डी

कांग्रेस सांसद के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले जगन मोहन रेड्डी आज कांग्रेस के लिए ही बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। अलग तेलंगाना राज्य के धुर विरोधी जगन की छवि एक गंभीर, दृढ़निश्चयी नेता की है, जो न केवल सोच-समझकर बोलते हैं, बल्कि शराब भी नहीं पीते हैं।

उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विधानसभा उपचुनाव में 18 में 15 सीटों पर उनकी पार्टी ने जीत हासिल की। तेलगांना मुद्दे पर आंध्र में कांग्रेस-विरोधी माहौल के कारण 2014 में वह एक बड़े क्षत्रप के रूप में उभर सकते हैं।
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