आज हम अपनी आजादी की 66वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हमारी सभ्यता के इतिहास में यह एक छोटा-सा कालखंड जरूर है, लेकिन महत्वपूर्ण है। अपने पूरे इतिहास में हम एकता की संस्कृति से जुड़े रहे हैं, हालांकि यहां राजनीतिक एकजुटता नहीं थी। हम यह नहीं जानते कि हमारी सभ्यता का उदय कब हुआ, लेकिन यह कुछ उन सभ्यताओं में से है, जो अब तक अस्तित्व में हैं। कई सभ्यताएं मिट गईं, लेकिन हमारा अस्तित्व बरकरार है, क्योंकि अनेकता, विविधता, हर व्यक्ति की अपनी पसंद और स्वतंत्रता जैसे महान विचार इसकी बुनियाद हैं।
हम विभिन्न साम्राज्यों का समूह थे और कई राजाओं ने हम पर शासन किया। जिनमें निरंकुश भी थे और क्रूर भी और कुछ परोपकारी तानाशाह भी। हमने अनेक हमले झेले, लेकिन उनमें ज्यादातर हमलावर हमारा हिस्सा बन गए। आखिरी हमलावर के रूप में एक कंपनी के व्यापारी हमारे यहां आए। उन्होंने छल-कपट और युद्ध के सहारे हम पर शासन किया। लेकिन उन्होंने हमें एकजुट कर दिया। हमारी संपत्ति हड़पकर उन्होंने दुनिया का सबसे वैभवशाली साम्राज्य खड़ा कर लिया। लेकिन उस महान साम्राज्य की चुनौती का सामना करने के लिए एक महात्मा की अगुवाई में हमने अपने अंदर के नैतिक साहस से खुद को एक अहिंसक संघर्ष के लिए तैयार किया और आजादी हासिल की।
हमने खुद से एक ऐसे राज्य के निर्माण का वायदा किया, जो भारत के विचार द्वारा एकजुट हो, जहां एक संविधान के माध्यम से प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की गारंटी हो और जहां कमजोर व्यक्ति को भी पूर्ण सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।
आजादी मिलने के वक्त हम गरीबी, भूख और अशिक्षा से जूझ रहे थे। हमने संघर्ष किया, एक पुरानी सभ्यता से एक नए देश का निर्माण किया और अब तक एक इकाई के रूप में अपना अस्तित्व बचाए रखा है। हमने काफी कुछ हासिल किया है।
हालांकि कई क्षेत्रों में हम विफल रहे हैं। क्रय क्षमता के आधार पर हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश हैं, लेकिन हमारे अनेक बच्चे भूख से जूझ रहे हैं। हमलावरों से सुरक्षा के लिए हमारे पास एक शक्तिशाली सेना है, लेकिन हमारी अनेक माताएं और बहनें बलात्कार और छेड़छाड़ का शिकार बनती हैं। हम चंद्रमा पर रॉकेट भेज चुके हैं, लेकिन अपने सभी लोगों को साफ पानी मुहैया नहीं करा पाए हैं। हमारे यहां अनेक पांच सितारा होटल हैं, लेकिन 55 फीसदी आबादी के घरों में शौचालय नहीं हैं।
यहां अनेक शानदार शैक्षिक संस्थान हैं, पर केवल 22 फीसदी युवा ही कॉलेज जा पाते हैं और 40 फीसदी से ज्यादा बच्चे स्कूल में 10 साल भी नहीं गुजार पाते। आम आदमी को एक पोस्टकार्ड के जरिये न्याय देने की व्यवस्था तो हमारे यहां है, लेकिन अनेक नागरिकों को सही समय सीमा के भीतर न्याय देने में हम विफल रहे हैं। हमने परमाणु रिएक्टर और परमाणु पनडुब्बियां बनाई हैं, लेकिन हमारी सड़कों पर गड्ढे मौजूद हैं। औपनिवेशिक शासन से बाहर निकलने के लिए हमने कई देशों की मदद की, पर हमारे यहां बंधुआ मजदूरी अब भी है।
इसका मतलब यह नहीं कि आजादी के वक्त किए गए वायदों को पूरा नहीं किया जा सकता। बल्कि सच यह है कि उसके लिए हमारे भीतर सामूहिक इच्छाशक्ति का अभाव है। इसलिए आज हमें रुककर यह प्रतिबिंबित करने की जरूरत है कि कैसे हम उन वायदों को हकीकत में तब्दील कर सकते हैं। हमें अपनी न्यायपालिका को दुरुस्त करने की जरूरत है, ताकि लोगों को समय पर न्याय मिल सके।
किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों न हो, दोषी पाए जाने पर दंडित किया जा सके। हर बच्चे को 12 साल की शिक्षा मिल सके और जो इच्छुक हों, उन्हें कॉलेज की शिक्षा मुहैया कराई जाए। देश के हर नागरिक के पास भोजन, शौचालय युक्त आवास, बिजली व पानी, घर तक सड़क, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं और गरिमापूर्ण जीवन यापन के लिए रोजगार की अच्छी संभावनाएं हों।
हमें ऐसा आर्थिक विकास चाहिए, जो भाई-भतीजावाद और एकाधिकार स्थापित किए बगैर सभी के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला रात में भी कामकाज के सिलसिले में बिना किसी डर के बाहर आ-जा सके। हमें अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करनी होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति संविधान में दिए गए अधिकारों का वास्तव में इस्तेमाल कर सके।
हमें अपनी सीमा को सुरक्षित करने की जरूरत है, ताकि कोई हमारी जिंदगी के लिए खतरा न पैदा कर सके। हमें अपने रुपये को इतना मजबूत करने की आवश्यकता है कि दुनिया भर में उसकी कीमत हो। हमें एक ऐसे देश का निर्माण करना है, जिसमें सुशासन हो, जहां लोगों को सार्वजनिक सेवाओं का लाभ रिश्वत के बिना उनके हक के रूप में मिल सके। एक ऐसा देश, जहां भ्रष्टाचार केवल बुरा स्वप्न बन जाए और सार्वजनिक सेवाएं सम्मान का प्रतीक हों।
हमें एक ऐसा देश चाहिए, जहां संसद का कामकाज लोगों की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करे और हमारे राजनेता जनादेश का पालन करें। वह वास्तव में लोकतंत्र का मंदिर बने। हमें एक ऐसे समाज की रचना करनी है, जो सत्य, निष्ठा और संवेदना के साथ खड़ा हो। इन सबमें सबसे अहम बात, हमें खुद का सम्मान करना होगा और अपने देश, सरकार और समाज को गंभीरता से लेना होगा। पहली बार आजादी का तिरंगा फहराते वक्त हमने खुद से ये वायदे किए थे। आज हमें देखना होगा कि इन वायदों को लेकर हम कहां खड़े हैं। इन्हें पूरा करने के लिए जितनी जल्दी हो सके, हमें पहल करनी चाहिए।
(लेखक आरिन कैपटिल पार्टनर के चेयरमैन और इंफोसिस बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं।)