भाजपा ने नरेंद्र मोदी सरकार पर राज्यपाल के तौर पर राजभवन में विराजमान खांटी कांग्रेसी नेताओं को हटाने का दबाव बढ़ा दिया है।
पद छोड़ने का संदेश देने के बाद सरकार अब राज्यपालों के रुख का इंतजार कर रही है।
यदि राज्यपालों ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया तो सरकार के पास उन्हें बर्खास्त करने का विकल्प खुला हुआ है।
तबादला होगा या बर्खास्तगी?
केंद्रीय गृह मंत्रालय लगभग आधा दर्जन राज्यपालों को पद छोड़ने का संकेत व संदेश दे चुका है लेकिन अब तक सिर्फ उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने ही इस्तीफा दिया है।
सरकार अब अन्य राज्यपालों की पहल का इंतजार कर रही है। माना जा रहा है कि यदि ये राज्यपाल पद नहीं छोड़ते हैं तो पहले चरण में उनका तबादला किया जाएगा और इसके बाद उन्हें बर्खास्त भी किया जा सकता है।
सरकार का मानना है कि कांग्रेस इस मामले में ज्यादा विरोध करने की हालात में नहीं है क्योंकि 2004 में यूपीए सरकार आने पर उसने भी एनडीए के नियुक्त कई राज्यपालों को बर्खास्त किया था।
इन राज्यपालों पर लटकी है तलवार
बहरहाल, सरकार चाहती है कि केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित, असम के राज्यपाल जेबी पटनायक, गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन, महाराष्ट्र के राज्यपाल के शंकरनारायणन और राजस्थान की राज्यपाल मारग्रेट अल्वा पद खाली कर दें।
अब तक इनमें से किसी ने भी पद छोड़ने का कोई सकेत नहीं दिया है। इससे सरकार की मुश्किल बढ़ती दिख रही है। दूसरी तरफ भाजपा चाहती है कि उसके वरिष्ठ नेताओं को जल्द से जल्द राजभवन भेज दिया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कैबिनेट का पहला विस्तार करने से पहले भाजपा के पुराने नेताओं को राजभवन भेजना चाहते हैं। ऐसे में यूपीए शासन में नियुक्त राज्यपाल मोदी सरकार की चुनौती बन गए हैं।
असम के राज्यपाल पटनायक पहले ही इस्तीफा देने से इनकार कर चुके हैं, जबकि शीला दीक्षित भी हटने को तैयार नहीं दिख रही हैं।