कभी धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर को अपना यह मुकाम दोबारा हासिल करने में अब लंबा वक्त लग सकता है।
वजह है कि राज्य सरकारों ने घाटी में बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए न तो पारंपरिक तौर-तरीकों को तवज्जो दिया गया और न ही नई तकनीकों के पर्याप्त इस्तेमाल को बढ़ावा ही दिया।
हश्र यह हुआ है कि पिछले 50 सालों में घाटी में जितनी संपन्नता आई, वह एक झटके में ही बाढ़ के साथ बह गई।
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के सदस्य एम सलीम बेग कहते हैं कि घाटी में राजनेता हमेशा राजनीति चमकाने में लगे रहे। कभी रखरखाव या बाढ़ की समस्या पर उनका ध्यान नहीं रहा।
अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य के बाढ़ नियंत्रण विभाग से काम लेना काफी पहले बंद हो चुका है। एक समय था जब बांध की देखभाल करने वाले (बॉर्न वाचर) सक्रियता से अपने काम में जुटे रहते थे।
वे बांधों के रखरखाव का पूरा ख्याल रखते थे। दरिया के जलस्तर पर लगातार निगरानी रखी जाती थी। क्योंकि पूरे कश्मीर में बाढ़ नियंत्रण के लिए बॉर्न बने हुए हैं। लेकिन अब उनसे काम नहीं लिया जा रहा है।