गुजरात उच्च न्यायालय ने प्रदेश के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के दावों के विपरीत राज्य में हो रहे विकास पर असंतोष प्रकट किया है।
गुजरात की चिकित्सा सुविधाओं पर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने पूछा है, 'राज्य के 9 आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए हैं, क्या ये राज्य का हिस्सा नहीं हैं।'
मंगलवार को गुजरात सरकार द्वारा स्वाइन फ्लू के मामलों पर पेश की गई एक रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनंत दवे ने कहा, 'कागजों पर लगता है कि गुजरात में सब ठीक है, लेकिन स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों से ये साफ हो गया है कि ग्रामीण इलाकों विशेषकर आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का पर्याप्त अभाव है।'
दरअसल, न्यायालय ने ये टिप्पणी गुजरात की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की उन याचिकाओं पर की, जिनमें उन्होंने स्वाइन फ्लू, मलेरिया और डेंगू से पीड़ित अपने परिजनों से मिलने के लिए अदालत से छूट मांगी थी।
26 मार्च को भी उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा था कि स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों के बाद भी राज्य सरकार इसे महामारी घोषित क्यों नहीं कर रही है?
न्यायालय ने इस बाबत सरकार से राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं और आधारभूत ढांचे का ब्यौरा भी मांगा था। मंगलवार को राज्य के स्वास्थ्य आयुक्त पीके तनेजा ने इस मामले में उच्च न्यायलय में एक हलफनामा दायर किया।
हलफनामे में बताया गया कि स्वाइन फ्लू को रोकने के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों में विशेष वार्डों और फ्लू की दवाओं के इंतजाम किए गए हैं।
हालांकि न्यायालय ने गुजरात के ग्रामीण इलाकों की चिकित्सा सुविधाओं पर असंतोष प्रकट किया और आदिवासी इलाकों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं न होने पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई।