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सोशल मीडिया पर भारी ‘सुषमाजी का बुलव्वा’

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गांव का खवास सुबह से निकलता है। घर-घर जाकर आवाज लगाता है- सुषमाजी का बुलव्वा रखा है, पटलन मां के घर, आ जाओ। महिलाएं एकत्र होती हैं। लोकगीत गाती हैं और संकल्प लेती हैं कि सुषमा स्वराज को जिताना है।
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सोशल मीडिया के जमाने में भारतीय समाज के इस प्राचीनतम औजार ने चुनाव प्रचार का माहौल बदलकर रख दिया है।

गांवों में जजमानी प्रथा के बचे-खुचे अवशेष भी लोकसभा चुनाव-2014 में लोकतंत्र के प्रभावी औजार बनकर सामने आए हैं।

गांवों के वोटर का लुभा रहा 'बुलव्वा'

सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र गंजबासौदा-विदिशा के गांवों में खवास (नापित) घर-घर जाकर महिलाओं को ‘सुषमाजी के बुलव्वे’ का न्यौता देकर आते हैं। महिलाएं उस घर में इकट्ठी होती हैं, लोकगीत गाती हैं और संकल्प लेती हैं, सुषमाजी को जिताने का।

हाथ में मेहंदी की जगह कमल का छापा लगाया जाता है। सौंफ-सुपारी के साथ हंसती हुई महिलाओं की यह टोली विदा होती है। विदिशा और बासौदा के गांवों में इस तरकीब ने प्रचार के सारे आधुनिक औजारों को परास्त दिया है।

भाजपा के युवा कार्यकर्ता राम रघुवंशी इस योजना को बासौदा और विदिशा के गांव-गांव तक ले जाना चाहते हैं। उनका कहना है कि गांवों की जनसंख्या की पहुंच सोशल मीडिया तक नहीं है। खासकर महिलाओं में शिक्षा का अभाव है और एक बड़ा वर्ग किसी भी मीडिया से बाहर है। उस वर्ग तक पहुंचने के लिए आपको पुराने तौर तरीकों से ही पहुंचना होगा।
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'ना प्रचार सामग्री, ना धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल'

सुषमाजी के बुलव्वे की खास बात यह है कि इसमें लागत बहुत कम आती है। राम बताते हैं कि पार्टी का इसमें कोई रोल ही नहीं है। जिसके घर बुलव्वा रखा जाता है, वही सौंफ-सुपारी जैसी सेवा कर देता है। उसी की दालान में यह कार्यक्रम हो जाता है। खवास अपनी इच्छा से बुलाने का काम कर देता है। इसलिए इसमें किसी को कोई खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती।

राम रघुवंशी का कहना है कि यह एक ऐसा तरीका है जिसमें कोई प्रचार सामग्री नहीं लगती। इसमें धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल नहीं होता। न ही किसी के खिलाफ कोई बात होती है।

उन्होंने कहा कि यह भारत के परंपरागत समाजीकरण की अद्भुत देन है जो मौजूदा इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया पर भी भारी पड़ता है। गांवों में आज भी राजनीतिक और सामाजिक मसलों पर चौपालों पर बहस होती है और बड़े-बड़े फैसले इनमें किए जाते हैं।
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