सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आजादी का दायरा क्या हो, सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को निपटाने की दिशा में सक्रिय हो गया है। फेसबुक पर कथित आपत्तिजनक संदेश लिखने के आरोप में बीते कुछ महीनों में हुई कई गिरफ्तारियों से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी कानून में बदलाव की मांग के निपटारे में अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती की मदद मांगी है।
याचिका में इस कानून की धारा 66 ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली की छात्रा श्रेया सिंघल की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल को अदालत की मदद के लिए कहा है। लेकिन पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ‘आपत्तिजनक’ संदेश लिखने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश सरकार को जारी करने से इंकार कर दिया। अदालत इस याचिका पर शुक्रवार को अगली सुनवाई करेगी। हाल ही में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ‘आपत्तिजनक’ संदेश लिखने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई है। याचिका में इसे कानून का दुरुपयोग बताया गया है।
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने इससे पहले सुबह श्रेया की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त करते हुए उनके अधिवक्ता को दोपहर में अदालत में पेश होने को कहा था। साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि हाल की घटनाओं के संदर्भ में अदालत इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेने पर विचार कर रही थी। न्यायाधीशों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि अभी तक ‘सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000’ के इस प्रावधान (66 ए) को किसी ने चुनौती क्यों नहीं दी।
श्रेया ने दलील दी है कि इस कानून की धारा 66 ए की शब्द रचना अस्पष्ट है और यह उद्देश्य का मानक निर्धारण करने में अक्षम है। इस वजह से इसका दुरुपयोग हो सकता है। याचिका में कहा गया है कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के संबंध में आपराधिक कानून पर अमल से पहले इसके लिए न्यायिक मंजूरी की अनिवार्यता के बगैर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।