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जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मरे आदमी को जेल भेज दिया!

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कहते हैं मरे हुए लोगों के पापों का हिसाब ऊपर वाले की अदालत में पहुंचकर होता है लेकिन हमारे सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल पहले मर चुके एक शख्स को जेल की सजा सुना दी। सुप्रीम कोर्ट को सात महीने बाद इस गलती का अहसास हुआ। सोमवार को कोर्ट ने माना कि उसने जिस शख्स को बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी, उसकी मौत तो तीन साल पहले ही हो चुकी है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गलती मानते हुए इस आदेश को भी वापस ले लिया। सुप्रीम कोर्ट ने ही बताया कि जिस शख्स को अप्रैल 2015 को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी, उसकी मौत 2012 में ही हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तामील करने के लिए पुलिस जब दोषी ठहराए गए शख्स के गांव पहुंची तो इस बात का खुलासा हुआ।

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भाई ने ही कर दी थी हत्या

जिस शख्स को दोषी ठहराया गया, उसकी हत्या तीन साल पहले उसके ही सगे भाई ने कर दी थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जमा कराई अपनी रिपोर्ट में पुलिस ने दोषी ठहराए गए शख्स का डेथ सर्टिफिकेट और उसकी पत्नी की तरफ से दर्ज कराई गई एफआईआर की कॉपी जमा कराई है। पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को भेजी अपनी रिपोर्ट में बताया कि दोषी ठहराए गए शख्स की मौत उस समय हो गई थी जब मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी।

हाईकोर्ट की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीसी घोष और आरके अग्रवाल की खंडपीठ ने अपने आदेश को रद्द कर दिया। गूंगे और बहरे शख्स पर 2006 में एक नाबालिग लड़की से रेप का आरोप लगाया गया था। इस शख्स को पहले निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था। आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोनों ही अदालतों ने उसकी पहचान परेड नहीं कराई थी और उसे बरी कर दिया था। इन अदालतों को उसके खिलाफ कोई सबूत भी नहीं मिला था।

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