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'खतरे से खाली नहीं लास्ट सीन थ्योरी के आधार पर दोषी ठहराना'

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक घटना और आखिरी बार आरोपी को पीड़ित के साथ देखे जाने के वक्त का अंतराल लंबा होने के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जाना खतरे से खाली नहीं है। इसके साथ शीर्ष अदालत ने जोधपुर हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए हत्या के दोषी को बरी करने का फैसला लिया है।
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न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने कहा कि आरोपी और पीड़ित को आखिरी बार देखे जाने में सटीक साक्ष्यों के अभाव और समय अंतराल लंबा हो तो इस नतीजे पर पहुंचना बेहद खतरनाक होगा कि आरोपी ही हत्या के लिए जिम्मेदार है।

पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही यह व्यवस्था दी गई थी सिर्फ लास्ट सीन थ्योरी केआधार पर आरोपी को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है। अभियोजन पक्ष की थ्योरी और आखिरी बार आरोपी व मृतक को देखे जाने से पहले और बाद की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही लास्ट सीन थ्योरी को इस्तेमाल करना चाहिए।
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क्या था मामला ?

मामले के मुताबिक, 26 जनवरी 2001 को मनोज नामक शख्स का शव संदिग्ध हालात में राजस्थान के गांव में मिला था। 21 गवाहों के बयान के आधार पर निचली अदालत ने निजाम को दोषी ठहराया था।

लास्ट सीन थ्योरी केआधार पर अदालत इस नतीजे पर पहुंची थी। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस सजा पर मुहर लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने इस मामले में पाया कि मनोज और आरोपी को एक ट्रक में देखा गया था। तीन दिन बाद मनोज की संदिग्ध हालात में मौत हुई थी।

अदालत ने यह भी पाया कि जिस जगह पर मनोज का शव मिला था, वहां कथित तौर पर वेश्यावृत्ति होती है, और अलग-अलग जगहों से वहां लोग मौज-मस्ती के लिए आते हैं। साथ ही अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की थ्योरी में कई छेद हैं।

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