फिल्म पीके को लेकर उठे विवाद में अब सिनेस्टार आमिर खान राहत की सांस ले सकते हैं। सर्वोच्च अदालत ने पीके फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि कला और मनोरंजन के मामले में धर्म को नहीं लाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पीके में कथित रूप से अश्लीलता को बढ़ावा देने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप लगाने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। सर्वोच्च अदालत को फिल्म के पोस्टर में आमिर खान को अर्द्धनग्न अवस्था में दर्शाने में कुछ भी गलत नहीं लगा।
राजकुमार हिरानी निर्देशित इस फिल्म में 48 वर्षीय आमिर खान को एक रेलवे लाइन पर नग्नावस्था में एक ट्रांजिस्टर से अपनी अस्मिता की रक्षा करते दिखाया गया है।
याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कथित रूप से अश्लीलता को बढ़ावा देने वाली आमिर खान अभिनीत फिल्म पीके के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिकाकर्ता के वकील नफीस सिद्दकी ने जब इस फिल्म का पोस्टर दिखाया तो न्यायाधीशों ने कहा कि इसमें क्या गलत है। इन बातों के लिए बहुत अधिक संवेदनशील होने की जरूरत नहीं है।
इस पर सिद्दकी ने तर्क दिया कि इसके पोस्टर धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं और इससे लोक व्यवस्था भंग हो सकती है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि ये कला और मनोरंजन का मामला है। इसे ऐसे ही रहने दिया जाए। धर्म के पहलू को इसमें नहीं लाया जाए।
'इंटरनेट युग में कुछ भी छुपा नहीं'
हालांकि पीठ ने जानना चाहा कि यह पोस्टर या फिल्म किस तरह से संविधान और कानून के प्रावधानों का हनन करती है। न्यायाधीशों ने सवाल किया कि क्या इससे कोई कानूनी या संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुए हैं।
फिल्म निर्माताओं पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाने से, जैसा आप चाहते हैं, उनके अधिकार प्रभावित होंगे। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इंटरनेट युग में युवा वर्ग से कुछ भी छिपा नहीं है और इसमें किसी प्रकार के निषेध आदेश की आवश्यकता नहीं है।
पीठ ने कहा कि हमारा समाज काफी परिपक्व है। इससे कोई भी आंदोलित नहीं होगा। यदि आपको पसंद नहीं तो आप यह फिल्म मत देखिए। याद रहे कि पीके फिल्म और इसके पोस्टर के खिलाफ अखिल भारतीय मानव अधिकार एवं सामाजिक न्याय मोर्चा ने याचिका दायर की थी।