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मतदाता को मिला 'राइट टू रिजेक्ट'

Fri, 27 Sep 2013 10:37 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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मतदाताओं के पास अब चुनाव में सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार भी होगा।
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वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर नकारात्मक वोट का बटन दबाकर सभी उम्मीदवारों के लिए अपनी नापसंदगी जाहिर कर सकेंगे।

शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में नकारात्मक मतदान को मंजूरी दे दी।

सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि राजनीतिक दल योग्य उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने के लिए बाध्य हों, इसके लिए मतदाता को नापसंदगी का अधिकार देना जरूरी है।

चीफ जस्टिस पी सदाशिवम, जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई और जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने निर्वाचन आयोग से कहा कि ईवीएम में ‘इनमें से कोई नहीं’ के बटन की व्यवस्था की जाए।

नकारात्मक वोटिंग जरूरी
पीठ ने कहा कि मतदान में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी के लिए नकारात्मक वोटिंग जरूरी है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि सबसे योग्य व्यक्ति को जनप्रतिनिधि चुना जाए।
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उच्च मानदंड तथा नैतिक मूल्यों के बल पर ही सर्वश्रेष्ठ लोगों को संसद या विधानसभा में लाया जा सकता है। एक जीवंत लोकतंत्र के संपूर्ण विकास के लिए ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ का विकल्प बेहद जरूरी है।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि मतदान लोकतंत्र का मूलमंत्र है। प्रत्येक बालिग मतदाता का यह वैधानिक अधिकार है कि वह अपने पसंद के उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि चुने।

नकारात्मक मतदान से समूची निर्वाचन प्रक्रिया में शुद्धता आएगी। नकारात्मक मतदान चुनाव प्रक्रिया में व्यवस्थित तरीके से बदलाव लाएगा क्योंकि राजनीतिक दलों को जनता की इच्छा मानने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

यदि बड़ी संख्या में लोग उनके प्रत्याशियों को अस्वीकार कर देंगे तो फिर उन्हें साफ सुथरी छवि के प्रत्याशी खड़े करने पड़ेंगे।

पीठ ने कहा कि मतदान करना किसी व्यक्ति का अभिव्यक्ति के अधिकार का हिस्सा है और यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) में दिया गया है।

13 देशों में यह लागू
किसी भी व्यक्ति को नकारात्मक मतदान की अनुमति नहीं देने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मकसद ही विफल हो जाता है। पीठ ने कहा कि दुनिया के 13 देशों में नकारात्मक मतदान की व्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबटर्जी (पीयूसीएल) की जनहित याचिका पर 48 पन्नों के फैसले में कहा कि मौजूदा स्थिति स्पष्ट रूप से नकारात्मक मतदान की नितांत आवश्यकता को इंगित करती है।

चुनाव में नकारात्मक मतदान की व्यवस्था के संदर्भ में अदालत ने संसद में मतदान व्यवस्था का भी उल्लेख किया है जहां- हां, नहीं और अलग रहना जैसे तीन बटन मतदान मशीन में होते हैं।

अदालत ने कहा कि इस तरह यह देखा जा सकता है कि सदस्यों को अलग रहने का बटन दबाने का विकल्प प्रदान किया गया है।

इस तरह इनमें से कोई नहीं के बटन की सुविधा याचिकाकर्ताओं ने मांगी है ताकि उपयुक्त प्रत्याशी नहीं होने पर मतदाता इससे अलग रहने के विकल्प का इस्तेमाल कर सके।

जल्द लागू करेंगे फैसला: चुनाव आयोग
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि वह इस फैसले को जल्द से जल्द लागू करेगा। ईवीएम में ‘इनमें से कोई नहीं’ के विकल्प वाले बटन की व्यवस्था की जाएगी।

अधिकारियों ने कहा कि आगामी सभी चुनावों में अब यही ईवीएम इस्तेमाल की जाएंगी। आयोग ने सरकार को लंबे समय से राइट टू रिजेक्ट का प्रस्ताव दे रखा था। लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली थी।

मतदाता की गोपनीयता रहेगी बरकरार
सर्वोच्च अदालत ने फैसले में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 128, निर्वाचन नियमावली की धारा 49 (ओ) और 41(2)(3) को गैरकानूनी करार दिया है जिसके तहत पहले वोटर को नकारात्मक वोटिंग के लिए एक फॉर्म भरना पड़ता था।

इससे उसके नकारात्मक मतदान की गोपनीयता भंग हो जाती थी। शीर्ष अदालत ने मतदाता की निजता को बरकरार रखने के लिए फैसले में चुनाव आयोग को सभी को नकारने का बटन ईवीएम में शामिल करने को कहा है।

लेकिन चुनाव पर नहीं पड़ेगा असर
मतदाता निजी तौर पर भले ही सभी उम्मीदवारों को नापसंद या नकार सकेंगे, लेकिन इससे चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यानी अगर चुनाव में कुल वोटिंग में 80 प्रतिशत मतदाता भी नापसंदगी जता दें तब भी प्रत्याशियों के पक्ष में शेष 20 फीसदी पड़े वोट तय करेंगे कि कौन जीता। इसमें से सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार विजेता माना जाएगा।

यह कहना है नकारात्मक मतदान का अधिकार दिए जाने की मांग करने वाले पीयूसीएल एनजीओ की ओर से याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता संजय पारिख का।

एनजीओ के अधिवक्ता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक पहल है जो मतदाताओं को नापसंदगी का अधिकार प्रदान करती है। यह राइट टू रिजेक्ट तक जाने का रास्ता साफ करता है।

जेडीयू ने फैसले का किया स्वागत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जनता दल (यूनाइटेड) ने स्वागत किया है। राज्यसभा सांसद केसी त्यागी ने कहा कि जेडीयू इस फैसले का स्वागत करती है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूरी तरह देखने के बाद ही उनकी पार्टी कोई प्रतिक्रिया देगी।

फैसले से 'आप' खुश
आम आदमी पार्टी ने भी फैसले का स्वागत किया है। पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने कहा कि अन्ना हजारे ने कहा था कि मेरी अगली लड़ाई 'राइट टू रिजेक्ट' और 'राइट टू रिकॉल' की होगी। हमारी पार्टी इस फैसले का तहेदिल से स्वागत करती है।

राइट टू रिजेक्ट
राइट टू रिजेक्ट का मतलब मतदाताओं को ईवीएम में वह सुविधा और अधिकार देना, जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है।

नियम-49-ओ
चुनाव आचार संहिता 1961 में नियम 49-ओ के नाम से जाना जाने वाला यह नियम मतदाता को यह अधिकार देता है कि अगर चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में से उसे कोई भी पसंद नहीं है तो बेहिचक वह अपनी नापसंदगी जाहिर कर सकता है।

फिलहाल क्या है व्यवस्था
नियम 49-ओ के तहत नापसंदगी जाहिर करने के लिए कोई फार्म नहीं है। मतदाता को बूथ के अंदर जाकर सबसे पहले 17-ए रजिस्टर में हस्ताक्षर, उंगली में स्याही लगवाने जैसी सारी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।

ईवीएम मशीन तक जाने के बाद अगर मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आता है तो बिना बटन दबाए वापस आकर पीठासीन अधिकारी से अपनी इच्छा जाहिर करनी होती है, फिर पीठासीन अधिकारी 17-ए रजिस्टर पर टिप्पणी करेगा कि मतदान से इंकार किया और मतदाता को दोबारा अपना हस्ताक्षर करना होता है।

ज्यादातर मतदाताओं को अभी इस अधिकार की जानकारी ही नहीं है।

राइट टू रिजेक्ट की मांग
ईवीएम में राइट टू रिजेक्ट का विकल्प में शामिल करने मामला कानून मंत्रालय के पास 2001 से लटका पड़ा है। राइट टू रिजेक्ट की मांग सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी जोरशोर से उठाई थी।

14वां देश होगा भारत
नकारात्मक मतदान की व्यवस्था वाला भारत 14वां देश होगा। यह व्यवस्था फिलहाल 13 देशों में प्रचलित है। इनमें अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम, ब्राजील, यूनान, यूक्रेन, चिली, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्वीडन शामिल हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मैं तहेदिल से स्वागत करता हूं। मुझे पक्का विश्वास है कि इसका हमारी राजनीति पर दूरगामी असर पडे़गा और यह चुनाव सुधार के लिए एक महान कदम होगा। इससे देश के लोकतंत्र को और प्रभावी बनाया जा सकेगा। अनिवार्य मतदान से लोकतंत्र को बड़ी मजबूती मिल सकती है।--नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री

राजनीतिक दलों पर कसता शिकंजा
11 जुलाई, 2013: हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में जातीय आधार पर की जा रही राजनीतिक दलों की रैलियों पर रोक लगाई
10 जुलाई, 2013: सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सांसद-विधायक निचली अदालत में दोषी करार दिए जाने की तिथि से ही अयोग्य हो जाएंगे।
3 जून, 2013: केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने एक फैसले में कहा कि राजनीतिक दल आरटीआई एक्ट के दायरे में आते हैं।

फैसले की खास बातें-
मतदाता चुनाव में ईवीएम में बटन दबाकर सभी उम्मीदवारों को नकार सकेंगे।
चुनाव आयोग ईवीएम में ‘इनमें से कोई नहीं’ के बटन की व्यवस्था करे।
इस अधिकार के चलते राजनीतिक दलों को योग्य प्रतिनिधि लाने होंगे।
उम्मीदवार योग्य होने से लोगों का भी मतदान के प्रति रुझान बढ़ेगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत नकारात्मक मतदान की व्यवस्था जरूरी।
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