नाबालिग से यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार आसाराम पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी करते हुए मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक अभियुक्त की रखवाली के लिए सुरक्षाकर्मियों की भीड़ की जरूरत नहीं है।
पीठ ने यह टिप्पणी लालबत्ती और वीआईपी सुरक्षा के दुरुपयोग के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में अगली सुनवाई 26 सितंबर को होगी।
जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पिछले चार-पांच दिनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखाया जा रहा है कि एक आरोपी की रखवाली के लिए सुरक्षाकर्मियों की भीड़ जुटी हुई है। इस तरह के लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने की कोई जरूरत नहीं है।
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सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जो स्पष्ट करते हैं कि धार्मिक या फिर राजनीतिक मैदान में नशा तस्कर उतरते हैं और फिर संपत्तियों पर कब्जा करना शुरू करते हैं। कानूनी पत्रिकाएं ऐसे मामलों से भरी हुई हैं। ऐसे लोग गंभीर अपराधों में शामिल रहते हैं।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि एक अतिरिक्त जिला व सेशन जज (अब तीस हजारी जिला अदालत में स्थित विशेष भ्रष्टाचार-विरोधी अदालत की अध्यक्षता करेंगे) ने पंजाब पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को पत्र लिखकर राज्य के दौर के लिए पायलट कार समेत सुरक्षा देने की मांग की है।
इस पर पीठ ने कहा कि हम इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजने जा रहे हैं। पीठ ने इस संबंध में साल्वे की ओर से पेश पत्र की प्रति दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजने का निर्देश जारी किया।
रजिस्ट्रार को यह प्रति हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या प्रोटोकॉल इंचार्ज के समक्ष पेश करने को कहा गया है। साथ ही पंजाब के अधिवक्ता को किसी भी सूरत में ट्रायल कोर्ट के जज को सुरक्षा मुहैया न कराने को कहा गया है।
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पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलीसीटर जनरल से साल्वे की ओर से पेश सुझावों पर जवाब देने को भी कहा है। साल्वे ने सुझाव दिया है कि सिर्फ संवैधानिक पदों का कार्यभार संभालने वालों को ही प्रोटोकॉल, सायरन और सुरक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी, इंटेलीजेंस ब्यूरो और राज्य पुलिस को कुछ लोगों को व्यक्तिगत तौर पर सुरक्षा मुहैया कराने से पहले जरूरत का मूल्यांकन करना चाहिए।
इस पर पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर लोग निजी एजेंसियों से सुरक्षा ले सकते हैं।