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सुप्रीम कोर्ट का जल्लीकट्टू पर रोक हटाने से इनकार

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इस पोंगल पर जल्लीकट्टू के आयोजन की अंतिम उम्मीद भी खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सांड़ों को वश में करने वाले इस खेल को इजाजत देने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने ही मंगलवार को केंद्र सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी थी, जिसमें जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया था।
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तमिलनाडु के कई लोगों तथा कम्पैशन अनलिमिटेड प्लस एक्शन नामक संगठन ने याचिका दायर कर अदालत से अपने आदेश को रद्द करने की अपील की थी। बुधवार को इस पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह अपने आदेश को वापस नहीं लेगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता एन राजारमण ने सुझाव दिया कि कोर्ट द्वारा नियुक्त कोर्ट कमिश्नर की निगरानी में जल्लीकट्टू को अनुमति दी जा सकती है। आयोजन के बाद कोर्ट कमिश्नर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप सकते हैं। हालांकि अदालत इस तर्क से अप्रभावित रही।
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3000 साल पुरानी है ये परंपरा

पीठ ने इस दलील को भी दरकिनार कर दिया कि यह बहुत प्राचीन परंपरा है और सांड़ किसानों के परिवार का हिस्सा हैं। अगर जल्लीकट्टू पर से प्रतिबंध नहीं हटाया गया तो किसानों को मजबूरन सांड़ों को वध के लिए केरल भेजना होगा। इस पर पीठ ने सवाल किया कि अगर सांड़ आपके परिवार का सदस्य है तो आप उसे वध के लिए केरल क्यों भेजते हैं।

राजारमण ने यह तर्क भी रखा कि जल्लीकट्टू 3000 वर्ष पुरानी परंपरा है और इसमें सांड़ों के साथ क्रूरता नहीं होती है। पोंगल के मौके पर इसका आयोजन किया जाता है। शहरों में रहने वाले और एनजीओ को जल्लीकट्टू की हकीकत तथा उसकी महत्ता के बारे में नहीं पता है। यह तमिलनाडु का सामाजिक और आर्थिक महोत्सव है। इस पर पीठ ने कहा कि जल्लीकट्टू के बगैर भी पोंगल आयोजित हो सकता है।
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