लोक सेवा आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार जैन और सदस्य फरमान अली को पद से हटाने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार और लोक सेवा आयोग से जवाब मांगा है। याचिका गोरखपुर के डॉ. धीरेंद्र सिंह और अधिवक्ता अंकित राय ने दाखिल की है।
इस मामले की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने प्रदेश सरकार, आयोग, डॉ. जैन और फरहान अली को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। याचिका को इस मामले में पहले से दाखिल याचिकाओं के साथ संबद्ध कर दिया गया है।
आयोग और प्रदेश सरकार के वकीलों ने इस मामले में प्रारंभिक आपत्ति की मगर पीठ ने उनकी आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए कहा कि पहले वह हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखें। याची के वकील आलोक मिश्र का कहना था कि डॉ. जैन और फरहान के संबंध में सूचना का अधिकार के तहत नई जानकारियां प्राप्त हुई हैं। डॉ. जैन के खिलाफ आगरा में दो आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इसके बावजूद उनको आयोग का सदस्य और बाद में कार्यवाहक अध्यक्ष बनाते समय सरकार ने इस तथ्य की अनदेखी की।
इसी प्रकार से सदस्य फरहान अली के मामले में भी नियुक्ति के समय योग्यता पर ध्यान नहीं दिया गया। फरहान अली स्वयं को अधिवक्ता बताते हैं मगर विधि के क्षेत्र में उनका क्या उल्लेखनीय योगदान है जिससे उनको महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर नियुक्ति दी जा सके पता नहीं है। उनका पंजीकरण भी उस समय के बाद का जो उन्होंने बताया है। कोर्ट ने सभी पक्षों को 25 फरवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द करने पर रोक
हाईकोर्ट ने 15 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती के मामले में ऐसे अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द करने के आदेश पर रोक लगा दी है, जिनको नियुक्ति पत्र प्राप्त हो चुके हैं। इनकी नियुक्तियां प्रदेश सरकार ने 14 दिसंबर 2015 केआदेश से रद्द कर दी थी। अंकित सिंह और चार अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल ने दिया है।
प्रकरण के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में 15 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती के लिए एक दिसंबर 2015 को विज्ञापन जारी किया गया था। बीईएलएड (बैचलर इन एलीमेंट्री एजूकेशन) डिग्री धारकों ने भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कोर्ट ने बीईएलएड डिग्री धारकों को भी प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया इस याचिका के निर्णय के आधीन होगी।
इस दौरान चयन पा चुके कुछ अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए। मगर कोर्ट का आदेश आने के बाद उनकी नियुक्तियों को एक दिसंबर 2015 को यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि बीईएलएड डिग्री धारकों को भी शामिल करने के बाद नियुक्ति पत्र जारी किए जाएंगे।
याची के वकील अशोक खरे का कहना था कि बीईएलएड डिग्री धारक मुश्किल से सौ की संख्या में होंगे, ऐसी स्थिति में नियुक्ति रद्द करने का औचित्य नहीं है। कोर्ट ने 14 दिसंबर 2015 के आदेश पर रोक लगाते हुए प्रदेश सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया है।
पॉलीथिन निर्माता कंपनियां पहुंचीं कोर्ट
प्रदेश में पॉलीथिन का निर्माण, बिक्री और उपयोग प्रतिबंधित करने के सरकार के निर्णय के खिलाफ पॉलीथिन निर्माता कंपनियां हाईकोर्ट पहुंच गई हैं। याचिका दाखिल कर कहा है कि सरकार ने प्रतिबंध लगाने का निर्णय मनमाने तरीके से लिया है। निर्णय लेने से पूर्व निर्माता कंपनियों को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, जबकि नियमानुसार सभी पक्षों को नोटिस जारी कर उनकी आपत्तियों को सुना जाना आवश्यक है। सरकार ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया है।
कंपनियों का कहना है कि सरकार ने पॉलीथिन के निर्माण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। इससे कंपनियां बर्बाद हो जाएंगी और लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। कंपनियों ने बड़ी मात्रा में कच्चा और निर्मित माल जमा है। निर्यात के आदेश ले रखे हैं उनको भारी नुकसान होगा। सरकार ने इन बातों का ध्यान रखे बिना मनमाने तरीके से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जबकि 40 माइक्रान या उससे अधिक की पॉलीथिन के निर्माण पर छूट होनी चाहिए थी।
इससे पूर्व अशोक कुमार और अन्य की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ को बताया कि प्रदेश सरकार ने न्यायालय के आदेशानुसार 22 दिसंबर को पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने की अधिसूचना जारी कर दी है। हमने नियमावली बना ली है। एक जनवरी से प्रतिबंध को प्रभावी कर दिया गया है।
इसका उपयोग बंद करने के लिए नगर निगमों द्वारा कार्रवाई की जा रही है। प्रतिबंध के बावजूद निर्माण, बिक्री या इस्तेमाल करने पर दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं। कोर्ट ने कंपनियों की याचिका पर प्रदेश सरकार को तीन फरवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई तीन फरवरी को होगी।