राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद अभियुक्त या पुलिस हिरासत में चल रहे व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62 (5) को जायज ठहराया है।
इस धारा के तहत जेल में सजायाफ्ता कैदी, न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत में चल रहे व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि मतदान के अधिकार से वंचित व्यक्ति लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता है।
जस्टिस एके पटनायक की अध्यक्षता वाली पीठ का यह महत्वपूर्ण फैसला राजनीति के गलियारों में तूफान ला सकता है।
पीठ ने सांसद और विधायकों को दोषी करार दिए जाने के साथ उनकी संसद तथा विधानसभा की सदस्यता रद्द करने का बुधवार को निर्णय दिया है।
उसके साथ ही यह भी कहा कि मतदान के अधिकार से वैधानिक रूप से वंचित व्यक्ति निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान चुनाव लड़ने का हकदार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का पांच पेज का यह फैसला बृहस्पतिवार को जारी किया गया।
दो साल की सजा तो जनप्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म
पटना हाईकोर्ट ने गैर सरकारी संगठन जन चौकीदार की याचिका पर अप्रैल 2004 में बंदियों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन उस समय लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। लिहाजा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
सर्वोच्च अदालत ने समय की नजाकत को भांपते हुए उस समय हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। लेकिन लगभग नौ साल के लंबे अंतराल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी।
पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62 के तहत मतदान की योग्यता का विवरण दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान ने देश के नागरिक को मतदान का विशेषाधिकार दिया है। लेकिन विशेषाधिकार के साथ कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं। बंदी होने पर अगर मतदाता सूची में नाम दर्ज भी है तो भी उसे मतदान का अधिकार नहीं है।
इसके लिए यह जरूरी नहीं कि उसका नाम मतदाता सूची से अस्थायी रूप से हटाया जाए। जब मतदान का अधिकार नहीं है तो चुनाव लड़ने का हक नहीं दिया जा सकता।
मालूम हो कि कई जनप्रतिनिधि जेल में रहकर चुनाव जीतते रहे हैं। जेल में रहने के कारण कई बार उम्मीदवार को सहानुभूति का लाभ भी मिल जाता है।
संपत ने आदेश को सराहा
मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने आपराधिक मामलों में दो साल की सजा पाए जाने पर सांसदों और विधायकों के अयोग्य होने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सराहना की है।
संपत ने कहा कि ऐसा आदेश पहले आ जाना चाहिए था। इससे चुनाव प्रक्रिया साफ हो सकेगी। उन्होंने कहा कि अपराध के मामले में निर्वाचित व्यक्ति और गैर निर्वाचित व्यक्ति में किसी तरह का अंतर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के आदेश से आशा है कि चुनाव साफ सुथरे हो सकेंगे। संपत आम चुनाव की प्रक्रिया को समझने भूटान की यात्रा पर हैं। भूटान में 13 जुलाई को आम चुनाव होने हैं।
उल्लेखनीय है कि राजनीति से अपराधियों को दूर करने के लिए अपने चुनाव सुधार कार्यक्रम के तहत चुनाव आयोग बहुत पहले से ही इस ओर पहल कर रहा था।