हमारी सरहद से कोसों दूर एक ऐसा शहर भी है, जिसके दिल में हिंदुस्तान ही बसता है। हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद कुछ अपना सा लगता है, कनाडा का टोरंटो शहर।
आसमान छूती इमारतें, आंखों के रास्ते दिल में उतरने वाली रंगीनियां-रोशनियां और भारत से 11 हजार किलोमीटर का फासला तय करके अपनी किस्मत लिखने पहुंचे हजारों भारतीय लोगों की भीड़। परदेस होते हुए भी यहां की हवा में हमारे मुल्क की खुशबू घुली है।
इसी खुशबू के साथ घुलने की कोशिश कर रही है एक आवाज, जो लखनऊ, छत्तीसगढ़ और दिल्ली से होते हुए पहले दुबई पहुंची और अब कनाडा में बस रही है।
पेशे से आर्किटेक्ट वंदना विश्वास को देखकर जरा भी अंदाजा नहीं होता कि वह सुरों की उस्ताद हैं। लेकिन तराना छेड़ते ही साफ हो जाता है कि उत्तर भारतीय क्लासिकल वोकल म्यूजिक की यह हुनरमंद गायिका गजल, नज्म, गीत और हल्की ठुमरियों में भी बढ़िया पैठ रखती हैं।
लेकिन वंदना का सफर आसान नहीं रहा। वह ठीक से चल नहीं पाती थीं। वंदना बताती हैं, "मैं सामान्य पैदा हुई थी, लेकिन डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से ऐसा हो गया।
उन्होंने बताया कि संक्रमित इंजेक्शन के इस्तेमाल की वजह से मेरा लेफ्ट हिप जॉइंट गल गया। एक पैर छोटा हो गया और अब हर वक्त दर्द होता रहता है।" वंदना ने शायद इसी दर्द को हुनर में बदल लिया।
मुश्किल मेलोडी भी आसानी से गाती थी वंदना
वह लखनऊ में पैदा हुईं और छत्तीसगढ़ के इंडस्ट्रियल टाउन कोरबा में पली-बढ़ीं। वंदना ने बताया, "मैं बचपन से गाती थी। मम्मी-डैडी ने गौर किया कि मैं मुश्किल मेलोडी भी आसानी से गा लेती हूं, इसलिए उन्होंने मुझे गांधर्व विश्वविद्यालय भेजा।
उन्होंने बताया, ''साढ़े पांच साल में मेरा वहां रजिस्ट्रेशन हुआ और मैंने नॉर्थ इंडियन क्लासिकल वोकल सीखना शुरू किया। सात साल की थी, तब पहला स्टेज परफॉर्मेंस दिया और इनाम जीता।''
वंदना बताती हैं, "मेरे पैरेंट्स की इच्छा थी कि मैं डॉक्टर बनूं, लेकिन मैंने फैसला किया कि पीएमटी नहीं करूंगी, क्योंकि मुझे डर था कि बतौर डॉक्टर मुझसे भी वैसी ही गलती हो गई, जैसी मेरे साथ हो चुकी है, तो मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी। डैडी इंजीनियर थे, इसलिए शुरू से इंजीनियरिंग में एक्सपोजर था, तो आर्किटेक्चर में दिल लग गया।"
म्यूजिक में भी देखा आर्किटेक्चर
वंदना इसके बाद दिल्ली में काम करने लगीं। फिर मुंबई से होते हुए दुबई पहुंचीं और इन दिनों टोरंटो में हैं। मौसिकी से समां बांधना और इमारतों के ढांचे तैयार करना, दोनों के ताल्लुक और तालमेल के बारे में पूछने पर वंदना कहती हैं, "आर्किटेक्चर भी आर्ट से जुड़ा है। उसमें आर्ट और टेक्नोलॉजी है। म्यूजिक में भी मैंने आर्किटेक्चर देखा है। इसमें राग हैं। वे कैसे काम करेंगे, कैसे जुड़ेंगे, इसके पीछे भी गुणा-भाग है। मुझे जो अनुभव आर्किटेक्चर में मिला, वो संगीत में काम आया।" हालांकि, एक वक्त ऐसा आया, जब संगीत की नींव पर आर्किटेक्चर की इमारत खड़ी हुई और सुरों की आवाज नक्शों के बीच कहीं गुम हो गई।
यहां वंदना के हमसफर विश्वास का जिक्र करना जरूरी होगा, जिन्होंने उन्हें दोबारा सुरों की दुनिया में लौटाया। विश्वास कहते हैं, "दुबई के बाद जब हम टोरंटो में जा बसे, तो वहां मैं देखता था कि जो लोग परफॉर्म कर रहे हैं, उनकी तुलना में वंदना कहीं बेहतर थीं।"
पति ने आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया
खुद वंदना भी बताती हैं, "हम जब दुबई चले गए, तो म्यूजिक पीछे छूट गया था। मेरी इच्छा थी कि पार्श्व गायन में जाऊं। मुझे एक्सप्रेसिव गाने अच्छे लगते थे। फिल्मी गीत सुनती, तो लगता कि मैं भी ऐसे गा सकती हूं। विश्वास अक्सर बोलते थे कि मुझे म्यूजिक में हाथ आजमाना चाहिए, लेकिन मैं नजरअंदाज करती रहती।"
जब यह दंपत्ति दुबई से टोरंटो जाकर बसा, तो बदलाव आया। वंदना ने कहा, "टोरंटो कॉस्मोपॉलिटिन है, वहां दुनिया भर के लोग हैं। हर तरह का म्यूजिक सुनने को मिलता है। अफ्रीकन, स्पेनिश, जापानी, अरेबियन। विश्वास नोटिस करते थे कि मेरी दिलचस्पी लौट रही है। मैं पहले उन पर चिल्ला देती थी, लेकिन फिर धीरे-धीरे दिलचस्पी आने लगी।"
पहला एलबम ′मीरा द लवर′
वंदना ने आखिरकार औपचारिक रूप से म्यूजिक इंडस्ट्री में उतरने का फैसला किया। वह बताती हैं, "मैं खुद कंपोज करती हूं, इसलिए सोचा कि मीराबाई के ऊपर कुछ काम करूं। बचपन में उनके कुछ भजन सुने थे। 2009 में मेरे पहले एलबम ′मीरा द लवर′ को दुनिया भर के दिग्गज आलोचकों ने सराहा।"
उनका दूसरा एलबम 2013 में आया, जिसका नाम ′मोनोलॉग्स′ था। वंदना की सफलता में उनके गुरुओं का भी खासा योगदान रहा। डी.के. गंधे और अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन से संगीत सीखने के बाद उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ काम करना शुरू कर दिया।
मराठी फिल्म में पार्श्वगायन का मौका मिला
वंदना हाल में एक खास मकसद के साथ्ा हिंदुस्तान वापस लौटी हैं। उन्हें हाल में एक मराठी फिल्म में पार्श्वगायन का मौका मिला है। ′मी स्वातंत्र होनार′ के लिए उन्होंने तीन गानों की रिकॉर्डिंग की है, जिनमें लावणी आइटम, विरह और एक खुशमिजाज गीत शामिल है।
वंदना ने पहली बार किसी फिल्म के लिए गाया है। इन दिनों वह ′समरसिद्धा′ उपन्यास के प्रचार पर आधारित गीतों पर काम कर रही हैं, जो अपनी तरह का पहला प्रयोग बताया जा रहा है। साथ ही 2015 की शुरुआत में आने वाले अपने तीसरे एलबम पर भी गौर कर रही हैं, जिसकी तासीर ग्लोबल होगी।
तरन्नुम की दुनिया में पूरी तरह रमने को तैयार
मराठी, बंगाली, कन्नड़, पंजाबी, सिंधी जैसी भाषाओं में गाने वाली वंदना को विश्वास की तरफ से पूरा सहयोग मिल रहा है। गिटार बजाने के शौकीन और वंदना के एलबम के लिए गीत लिख चुके विश्वास जानते हैं कि वंदना हिंदी फिल्मों के लिए गाना चाहती हैं और इसके लिए इमारतों की डिजाइनिंग छोड़कर ये दोनों तरन्नुम की दुनिया में पूरी तरह रमने को तैयार हैं।
उन्हें अब मौके का इंतजार है। जगजीत सिंह को संपूर्ण गायक मानने वाली वंदना भविष्य में कंसर्ट, एलबम और फिल्मों, तीनों मोर्चों पर अपनी गायन प्रतिभा का लोहा मनवाना चाहती हैं। छत्तीसगढ़ के कोरबा से टोरंटो तक का सफर तय करने वाली आर्किटेक्ट वंदना विश्वास अब सुरों की इमारत से दुनिया को सजा रही हैं।