उत्तर प्रदेश की 11 विधानसभा में से आठ और एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज करने के बाद भले ही कहा जा रहा हो कि सपा के अच्छे दिन आ गए हैं। मगर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इन अच्छे दिनों को क्षणिक मान रहे हैं।
पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का अनौपचारिक बातचीत में मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश सरकार के लिए गिनी चुनी सीटों पर हुए उपचुनाव की तर्ज पर जीत दर्ज करना इतना आसान नहीं रहेगा।
सूत्रों का मानना है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था, दंगों, बिजली, सड़क जैसे मुद्दे को लेकर निशाने पर रही सपा के लिए आने वाले दिन अच्छे तो पता नहीं, लेकिन चुनौतीपूर्ण जरूर होंगे।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आकलन है कि अगर सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ती है, तब ही भाजपा को विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर दी जा सकती है।
पार्टी के भीतर ही उठ रहे सवाल
सपा के आंतरिक आकलन के मुताबिक प्रदेश में मायावती की बसपा के विधानसभा उपचुनाव में मैदान से गायब रहने के चलते भी पार्टी को काफी फायदा हुआ है।
बसपा अगर मैदान में होती तो सपा के खाते में आई सीटों का बंटवारा हो सकता था। इसलिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री को इस जीत का जश्न मनाने के बजाय आगामी रणनीति और सुशासन पर विचार करना होगा।
उत्तर प्रदेश में सपा सरकार मार्च, 2012 में आई थी। गृह मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा के 2012 में 118 तो 2013 में 247 मामले सामने आए हैं।
अच्छे दिन पर सस्पेंस में सपा नेता
पिछले साल मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान सेना तक बुलानी पड़ी। प्रदेश के 20 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सेना को तैनात करना पड़ा।
दंगों के बाद शरणार्थी शिविरों में बच्चों की मौत और सरकार की लापरवाही किसी से छिपी नहीं है। उधर, सपा की तरह कांग्रेस की स्थिति भी प्रदेश में कमजोर मानी जा रही है। पार्टी ने सभी 11 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। मगर एक सीट पर भी पार्टी को जीत नहीं मिली।
कांग्रेस महासचिव शकील अहमद कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में हम चाहते थे कि अच्छा करें। मगर भाजपा की घृणा फैलाने वाली राजनीति के कारण लोगों ने सोचा कि भाजपा को कौन हराएगा, उसे ही वोट दिया। इसलिए कांग्रेस को सीट नहीं मिल पाई।