भाषण में विरोध और संकट में सहयोग। यूपीए 2 के पांच साल के कार्यकाल के दौरान सपा और बसपा को लगातार इसी भूमिका में देखा गया था। तब यह कहा जाता था कि सीबीआई जांच में घिरे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा प्रमुख मायावती मजबूरन यूपीए के हर फैसले का समर्थन करने को बाध्य हैं। अब नई लोकसभा में भी वही सिलसिला शुरू होता दिख रहा है।
दोनों ही सरकार के कार्यकाल में अंतर बस इतना है कि भाजपा को सपा-बसपा के अलावा एक तीसरा खेवनहार तृणमूल कांग्रेस के रूप में मिला है। माना जा रहा है कि सीबीआई के पास अब भी तकनीकी रूप से आय से अधिक संपत्ति मामले में मुलायम सिंह और मायावती के खिलाफ मामला बनाए रखने के कई रास्ते हैं, जबकि शारदा चिट फंड घोटाले में सुप्रीम कोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश के बाद तृणमूल कांग्रेस के कई दिग्गज नेता बुरी तरह घिर गए हैं।
यही कारण है कि बजट सत्र के शुरुआती दो दिनों तक आक्रामक तेवर अपनाने वाले तृणमूल कांग्रेस के नेता अचानक सदन में सरकार का सहयोग करते दिख रहे हैं।