यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने आज कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में 15 साल पूरे कर लिए। भारतीय राजनीति की धुरी कांग्रेस में ये एक अनोखी उपलब्धि है।
सोनिया ने 1998 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को हटाकर पार्टी की बागडोर संभाली थी। 66 वर्षीय सोनिया गांधी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी सफलता 2004 में कांग्रेस की केंद्र में वापसी थी। हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बजाय उन्होंने कांग्रेस का नेतृत्व करना ही स्वीकार किया।
ये 15 वर्ष कांग्रेस के लिए उतार चढ़ाव भरे भी रहें हैं। केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से यूपीए सरकार लगातार दो बार सत्तारुढ़ हुई लेकिन कई राज्य कांग्रेस के हाथ से फिसल भी गए।
ऐसे में वो कौन सी सात उपलब्धियां है जो सोनिया गांधी के खाते में जाएंगी-
1-खस्ताहाल कांग्रेस को किया मजबूत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 1991 में राजीव गांधी की मृत्यु के बाद उनकी बेवा सोनिया गांधी को पार्टी की कमान संभालने का प्रस्ताव दिया था।
कांग्रेस की परंपरा भी यही थी, आजादी के बाद से पार्टी की राजनीति नेहरु-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही थी। ऐसे में राजीव की मृत्यु के बाद सोनिया ही अध्यक्ष पद की एकमात्र दावेदार थी, लेकिन उन्होंने पार्टी की कमान संभालने से इनकार कर दिया।
1991 में कमजोर विपक्ष और राजीव की मृत्यु से उभरी संवेदना की बदौलत कांग्रेस सत्ता में आई। हालांकि 1995 में केंद्र से बाहर होने के साथ ही पार्टी की जमीन दरकने लगी। पार्टी में गुटबाजी उभर कर सामने आने लगी, नरसिंह राव को अध्यक्ष पद से हटाया गया और सीता राम केसरी को अध्यक्ष बनाया गया।
केसरी के कार्यकाल में कांग्रेस की दरार गहरा गई। अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी और जीके मुपनार जैसे नेता कांग्रेस छोड़ कर चले गए और पार्टी खस्ताहाल हो गई।
ऐसे में कांग्रेस नेताओं की अपील पर सोनिया ने पार्टी की कमान संभालने पर सहमति जता दी। सोनिया ने अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी छोड़कर जा चुके नेताओं को वापस बुलाया और खस्ताहाल संगठन को मजबूती दी।
2-केंद्र में कांग्रेस को वापस लेकर आईं
सोनिया ने जब कांग्रेस की कमान संभाली, तब वह सत्ता से बाहर थी। आजादी के बाद से ये कांग्रेस का सबसे बुरा दौर था। राम मंदिर की लहर पर सवार होकर भाजपा कई राज्यों में सत्ता पा चुकी थी। जनता दल, समाजवादी पार्टी और वाम संगठन में अपने-अपने गढ़ में मजबूत थे।
1999 में हुए चुनावों में भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आने में कामयाब रहा। सोनिया ने अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार 1999 में ही लोकसभा चुनाव लड़ा था। ये चुनाव उनके राजनीतिक करियर के पहले इम्तहान थे।
सोनिया ने एक साथ अमेठी और बेल्लारी, दो सीटों से चुनाव लड़ा। बेल्लारी में भाजपा की तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज उनके खिलाफ खड़ी हुईं।
सोनिया गांधी के आगे उन्हें भी मुंह की खानी पड़ी। सोनिया ने दोनों सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि पार्टी का प्रदर्शन निहायत ही खराब रहा।
2004 में तमाम कयासों और भविष्यवाणियों को धता बताते हुए सोनिया गांधी कांग्रेस को केंद्र में वापस लेकर आईं। यह वो दौर था जब भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में शीर्ष पर थे। भाजपा के 'भारत उदय' और 'इंडिया शाइनिंग' की गूंज चारों ओर थी।
3-राज्यों में कांग्रेस को किया मजबूत
1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो केंद्र में ही नहीं राज्यों में भी पार्टी की चूलें दरक चुकी थीं। उत्तर प्रदेश और बिहार से तो कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया था।
राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से भी कांग्रेस बाहर हो चुकी थी। सोनिया गांधी ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने राज्यों में कांग्रेस को सांगठनिक रूप से मजबूत किया और उसे सत्ता में लाने में कामायाब रही।
उनके पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और केरल में सत्ता में आने में कामयाब रही।
हालांकि उनके कार्यकाल में ही दक्षिण भारत में भाजपा का खाता खुला और कर्नाटक में पहली बार उनकी सत्ता कायम हुई। मध्य प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस लगातार पराजय का मुंह देख रही है।
4-राज्यों में तैयार किया नेतृत्व
बतौर अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस को सत्ता के करीब ही नहीं लाई, पार्टी को सांगठनिक मजबूती भी दी। उन्होंने कांग्रेस के भीतर सभी राज्यों मे मजबूत नेतृत्व तैयार किया।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और आंध्र प्रदेश के दिवंगत नेता व पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी इसके उदाहरण हैं।
महाराष्ट्र में पिछले 15 सालों में कई बार नेतृत्व संकट उभरा। सोनिया ने हर बार नए चेहरे का मौका दिया। दिवंगत नेता विलास राव देशमुख, अशोक चह्वाण और वर्तमान मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण को सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में नेतृत्व की कमान दी।
5-पार्टी से स्थानीय क्षत्रपों को किया खत्म
कांग्रेस में स्थानीय क्षत्रप आजादी के बाद से ही मजबूत रहे हैं। सोनिया गांधी के पार्टी की कमान संभालने के बाद से क्षत्रप राजनीति का विरोध किया।
उन्होंने क्षत्रपों की मजबूती के बजाय राज्यों में पार्टी नेतृत्व को मजबूत करना ज्यादा जरूरी समझा। उनके नेतृत्व में पार्टी की केंद्रीय कमेटी धीरे-धीरे स्थानीय क्षत्रपों पर हावी होती गई। आज हालात ये हैं कि पार्टी के भीतर हर छोटा-बड़ा फैसला केंद्रीय कमेटी ही करती है।
जिला अध्यक्ष तक नियुक्ति का फैसला भी कांग्रेस की केंद्रीय कमेटी ही करती है, जबकि पहले ये फैसले राज्य स्तर पर कर लिए जाते थे।
6-सत्ता का समानांतर केंद्र
सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में प्रत्यक्ष जवाबदेही के बिना शक्ति के केंद्रीकरण का नया सिद्घांत दिया। 2004 में कांग्रेस के सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनकर उभरने के बाद सोनिया ने खुद प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी। वह पिछले नौ सालों से देश की कमान संभाले हुए हैं लेकिन इस बीच सोनिया गांधी सत्ता के समानांतर केंद्र कें रूप में उभरीं।
उन्होंने कई बार सुपर पॉवर भी कहा गया। हालांकि ये कांग्रेस की परंपरा से बिलकुल अलहदा चीज थी। कांग्रेस जब भी सत्ता में रही प्रधानमंत्री मजबूत रहा, जबकि पार्टी अध्यक्ष कमजोर रहे।
सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के समानांतर खड़ी हुई और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को प्रधानमंत्री से भी ज्यादा ताकतवर बनाने की कोशिश की।
7-सेकुलर पार्टियों का किया ध्रुवीकरण
भारतीय राजनीति में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस गैर भाजपा दलों की धुरी बनकर उभरी। उन्होंने 2004 और 2009 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को तो जीत दिलाई ही, सेकुलर दलों को एकजुट कर सत्ता में आने में भी कामयाब रहीं।
उन्होंने राज्यों में भी सेकुलर दलों को कांग्रेस की इर्द-गिर्द एकजुट किया। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगभग 10 सालों से भाजपा विहीन राजनीति का केंद्र बनी हुई हैं।