सोनिया गांधी पिछले 15 सालों से भारतीय राजनीति के केद्र में हैं लेकिन उनकी शख्सियत के कई ऐसे पहलू हैं, जो शायद ही कभी हमारे सामने आए हों।
यहां हम कुछ ऐसे राजनीकि घटनाक्रमों को जिक्र कर रहे हैं, जो उनकी शख्सियत से हमें रूबरू करा सकते हैं-
घटनाक्रम- 1
दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा मैटर्स ऑफ डिस्क्रिशन में नवबंर, 1997 के दूसरे पखवाड़े के दौरान चले उस तेज घटनाक्रम का जिक्र किया है, जब कांग्रेस के समर्थन खींचने के बाद संयुक्त मोर्चा की उनकी सरकार गिर गई थी।
उन्होंने लिखा, 'तारीखः 16 नवंबर, 1997.... सीताराम केसरी लंच पर आए। सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद वह प्रसन्न दिख रहे थे (या ऐसा लग रहा था)। राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक उन्होंने (सोनिया ने) केसरी पर दबाव बनाया है कि वह मेरी सरकार गिरा दें।
शुरू में वह इस गंभीर मुद्दे पर बात करने को लेकर अनमने दिखे, लेकिन बाद में उन्होंने मुझे बताया कि उनकी मुलाकात के दौरान वे (सोनिया) बहुत भावुक थीं.....।'
उस समय कांग्रेस का एक तबका सरकार के खिलाफ मुखर हो रहा था और चाहता था कि द्रमुक के मंत्रियों को हटाया जाए। गुजराल का आकलन था कि पार्टी में केसरी की पकड़ कमजोर पड़ रही थी और आखिरकार 21 नवंबर को उन्होंने राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप दिया।
यह घटनाक्रम बताता है कि सोनिया गांधी ने भले ही कांग्रेस की कमान 1998 में संभाली, मगर उनकी गिरफ्त में पार्टी पहले से थी।
घटनाक्रम- 2
17 अप्रैल, 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मुश्किल से एक साल चलने के बाद भारतीय राजनीति के सबसे नाटकीय घटनाक्रम में महज एक वोट से गिर गई थी।
21 अप्रैल को सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति आर के नारायण से मुलाकात कर अगली सरकार बनाने का दावा ठोका। कांग्रेस के पास महज 114 सीटें थीं और जो दल उसे समर्थन देने के लिए तैयार हुए थे उसमें समाजवादी पार्टी भी थी।
मगर ऐन वक्त पर मुलायम सिंह यादव ने समर्थन से इंकार कर दिया, जिससे वह नहीं हो सका, जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी को संभवतः सबसे अधिक परेशानी होती।
घटनाक्रम- 3
18 मई, 2004 को जब यह तय हो गया कि कांग्रेस की अगुआई में ही अगली सरकार बनेगी, तब 24 अकबर रोड और 10 जनपथ के आसपास सोनिया गांधी के समर्थकों का हुजूम जमा हो गया था और उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने के लिए दबाव बना रहा था।
इसी दिन कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया ने भावुक होकर यह घोषणा कर दी.... पिछले छह वर्षों से जबसे मैं राजनीति में हूं, मेरे मन में एक बात स्पष्ट थी। और वह, जैसा कि मैं अक्सर कहती हूं कि प्रधानमंत्री का पद मेरा लक्ष्य कभी नहीं रहा....।
उसके बाद जो हुआ वह भी भारतीय राजनीति का ऐसा इतिहास है जिसने कांग्रेस और सोनिया के बारे में कई मिथक गढ़े हैं और कई तोड़े हैं।
दरअसल इन तीन घटनाक्रमों में सोनिया की शख्सियत को देखा जा सकता है। वह सत्ता और समर्पण का अद्भुत विरोधाभास हैं।
कभी राजीव गांधी और सोनिया गांधी के अंतरंग मित्रों में रहीं, प्रख्यात पत्रकार तवलीन सिंह ने अपनी किताब दरबार में लिखा है कि इंदिरा गांधी के बाद सोनिया ने न केवल राजीव के पहनावे और खानपान में बदलाव लाया, बल्कि उनकी छाया कांग्रेस के भीतर भी नजर आने लगी और पार्टी की पारंपरिक समाजवादी चेहरा भी बदलने लगा।
1970 के दशक में जब राजीव राजनीति में नहीं आए थे, सोनिया की दिलचस्पी भी राजनीति में बिल्कुल नहीं थी। मगर 19 मई, 1991 को राजीव की हत्या के बाद देश की राजनीति का वह एक प्रमुख केंद्र बन गईं।
बेशक उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने में सात वर्ष लग गए, मगर पिछले 15 वर्षों में कांग्रेस की वही धुरी हैं।