फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बंगाल कांग्रेस की आखिरी उम्मीद - सौमेन मित्र

विज्ञापन
विज्ञापन
दीदी की निरंकुशता के खिलाफ पहली आवाज उनकी विधायक पत्नी ने उठाई थी। लेकिन बाहर पहले वह निकल आए। किसी को अंदाजा नहीं था कि धूम-धड़ाके में यकीन न करने वाले सौमेन मित्र ऐलान करके ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं।
विज्ञापन


जो लोग सौमेन मित्र को जानते हैं, उनके लिए छोड़दा का यह रवैया चकित करने वाला है। लेकिन बड़े फैसले लेने की टाइमिंग उन्हें बड़ा नेता साबित करती है। ममता बनर्जी के सिंगूर आंदोलन के दौरान वह तृणमूल कांग्रेस से जुड़े थे।

यह वह समय था, जब वाम मोर्चा सरकार की निरंकुशता के खिलाफ ममता के इर्द-गिर्द राज्य के तमाम लोकतंत्रकामी लोग इकट्ठा हो रहे थे। और जनवरी, 2014 में एआईसीसी में राहुल गांधी के धमाकेदार भाषण से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस में लौटने का समय चुना।
विज्ञापन


इस भाषण ने राहुल की न सिर्फ एक संभावनाशील, ऊर्जस्वित छवि बनाई है, बल्कि इसी कारण यह भरोसा बना है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी केंद्र की सत्ता भले न बचा पाए, अपनी साख कमोबेश बचा ले जाएगी।

पर सवाल यह है कि कांग्रेस के पुराने सिपाही सौमेन मित्र क्या बंगाल में यह काम कर पाएंगे।

वाम विरोध की तिकड़ी

अस्सी के दशक की शुरुआत में वह पश्चिम बंगाल के उन तीन दमदार विपक्षी नेताओं में थे, जो कांग्रेस में रहकर वाम विरोध का झंडा बुलंद कर रहे थे।

इनमें ममता बनर्जी सबसे साहसी, बल्कि सनकी होने की हद तक दुस्साहसी थीं, तो सुब्रत मुखर्जी बेहद महत्वाकांक्षी और घनघोर अवसरवादी। जबकि संगठन पर सबसे मजबूत पकड़ इन तीनों में से सौमेन मित्र की थी।

गनी खान चौधुरी जब राज्य कांग्रेस प्रमुख थे, तब उन्होंने सौमेन मित्र को महासचिव बनाया था। जिम्मेदारी संभालने के तत्काल बाद उन्होंने पूरे राज्य का दौरा किया था।

वाम सत्ता के खिलाफ कांग्रेस को राज्य में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर खड़ा करने में सौमेन मित्र का योगदान बहुत ज्यादा रहा है। उनकी सांगठनिक क्षमता के कारण ही प्रणब मुखर्जी से लेकर प्रियरंजन दासमुंशी तक जरूरत पड़ने पर उनकी मदद लेते थे।

अपने भाषण में सबसे ज्यादा भीड़ लुटा लेने वाली ममता बनर्जी भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में अगर सौमेन मित्र से हार गई थीं, तो उसका कारण पार्टी संगठन पर उनका दबदबा ही था।

1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाया, तो उसके पीछे भी बंगाल कांग्रेस पर सौमेन मित्र का वर्चस्व ही कारण था।

ममता के साथ

सवाल यह है क‌ि जिन ममता बनर्जी से उनकी पटी नहीं, उनकी पार्टी में वह गए क्यों थे। इसका जवाब वाम मोर्चे की विरोधिता है। 1977 से पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का लगातार शासन था। उस दौरान राज्य में विपक्ष की जो राजनीति पनपी, वह घनघोर वाम विरोधी थी।

प्रणब मुखर्जी और प्रियरंजन दासमुंशी ने चूंकि केंद्र की राजनीत‌ि ही ज्यादा की, इसलिए उनमें वैसा वाम विरोध नहीं दिखा, बल्कि प्रणब दा से तो वाम मोर्चे की नजदीकी बताई जाती है। लेकिन ममता, सौमेन और सुब्रत-ये तीनों कम्युनिस्ट राजनीत‌ि से किसी बिंदु पर सहमत हो ही नहीं सकते। इसी बीच 2004 में केंद्र की यूपीए सरकार वाम मोर्चे के समर्थन से बनी। इसका असर बंगाल में कांग्रेस और वाम मोर्चे के बीच रिश्ते में भी दिखा। सोमेन मित्र लेफ्ट से नरमी के खिलाफ थे।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व उनकी बातें अनसुनी करता रहा। फिर चूंकि वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी नहीं थे, इसलिए भी पार्टी में अपनी उपेक्षा का एहसास उन्हें हो रहा था। लिहाजा ममता बनर्जी ने जब वाम मोर्चे के खिलाफ संघर्ष को धार दी,तब वाम विरोध के तर्क पर सौमेन ने पार्टी छोड़ी। जुलाई, 2008 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर प्रगतिशील इंदिरा कांग्रेस बनाई, जिसका अक्तूबर, 2009 में तृणमूल में विलय हो गया। तब उन्होंने स्वीकारा था कि राज्य में वाम मोर्चे के खिलाफ ममता ही सबसे बड़ी भूमिका में हैं।

वहां भी उपेक्षा

ममता ने सौमेन को तृणमूल में जगह दी। दक्षिण चौबीस परगना के डायमंड हार्बर से वह तृणमूल के टिकट पर सांसद भी चुने गए। लेकिन एक वरिष्ठ नेता के तौर पर वहां उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। उन्होंने वाम मोर्चा शासन का चरम देखा था, जहां पार्टी जनता से बड़ी हो गई थी। वाम मोर्चे का विकल्प बन चुकी तृणमूल भी धीरे-धीरे उसी के रंग-ढंग में ढलती गई। पार्टी का जनता के सरोकारों से कोई मतलब नहीं रह गया था। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र नहीं था।

कोई शिकायत करता, तो उसे कम्युनिस्ट बता दिया जाता। महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते गए, लेकिन सरकार का नजरिया नहीं बदला। ममता के राज में चिटफंड कंपनियों का वर्चस्व जिस तरह सरकार के कामकाज और नए मीडिया हाउसों के गठन तक फैलने लगा, उससे सौमेन मित्र का माथा ठनका। पहले राज्य के अपने सहयोगियों को उन्होंने इस बारे में आगाह करने की कोशिश की। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला, तो केंद्रीय वित्त मंत्री से बंगाल की चिटफंड कंपनियों की जांच कराने का आग्रह किया।

अब तक ममता ने सौमेन को दबाकर रखा था। लेकिन उनके इस कदम को ममता ने चुनौती के तौर पर देखा। इसी दौरान सौमेन मित्र की मौजूदगी में ही एक मंच पर तृणमूल के कुछ नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के वर्चस्ववादी तौर-तरीकों पर सार्वजनिक टिप्पणी की। उन सबके खिलाफ कार्रवाई कर सौमेन को संदेश देने की कोशिश की गई।

लेकिन तब तक वह तृणमूल छोड़ने का मन बना चुके थे। वह चकित थे कि बीमार सुचित्रा सेन को देखने जाने का समय तो मुख्यमंत्री के पास है, लेकिन दो-दो बार बलात्कार का शिकार हुई नाबालिग के पास खड़े होने का वक्त उन्हें नहीं है। उनकी टिप्पणी थी कि तृणमूल नेतृत्व हिटलर के दौर की नाजी जुबान में बोल रहा है।

सौमेन की यूएसपी

सौमेन मित्र की वापसी से कांग्रेस के मजबूत होने की संभावना बनी है, तो यह अकारण नहीं है। राज्य के बंगाली मध्यवित्त समाज में उनकी मजबूत पैठ है। यह खाता-पीता वर्ग बेहद बहुत अमीर नहीं है, लेकिन बंगाल में शिक्षा से लेकर संस्कृति और राजनीत‌ि तक में यही सबसे प्रभावी भूमिका में है। चुनावों में वोटिंग पैटर्न भी यही तय करता है।

सांगठनिक क्षमता के धनी होने के कारण आसनसोल, चौबीस परगना, बर्नपुर, रानीगंज जैसे उद्योग बहुल इलाकों में सौमेन का प्रभाव है। उन्होंने ममता बनर्जी पर वायदा खिलाफी के अलावा औरतों की सुरक्षा न कर पाने का भी आरोप लगाया है। खासकर इसका लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में कुछ असर दिख सकता है। हावड़ा, टिटागढ़, मालदह, बैरकपुर और उत्तर बंगाल के चाय बागानों में हिंदी भाषियों की बड़ी संख्या है। ये वही इलाके हैं, जो सौमेन के प्रभाव क्षेत्र में पड़ते हैं।

वह कांग्रेस में मुस्लिमों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में जाते हैं। बेशक यह समुदाय चुनाव में तृणमूल का साथ नहीं छोड़ेगा, लेकिन जिस राज्य में मुस्लिम वोट 26 से 28 फीसदी हो, वहां सौमेन की वापसी से कांग्रेस अल्पसंख्यकों के कमोबेश समर्थन की प्रत्याशा तो कर ही सकती है।

पर उम्मीद कितनी

लेकिन सवाल यह है कि उनके लौटने से कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में कितना लाभ मिल जाएगा। जिस ग्राम बांग्ला पर अपनी मजबूत पकड़ के कारण वाम मोर्चा करीब साढ़े तीन दशक तक अपना शासन चलाता रहा, उस पर अब तृणमूल का कब्जा है। कांग्रेस का नेटवर्क ध्वस्त हो चुका है। पहले रेल मंत्री के रूप में और बाद में राज्य के मुख्यमंत्री की भूमिका में ममता ने प्रांत में कांग्रेस का लगभग सफाया ही कर दिया है।

ऐसे में करीब दो महीने में सौमेन दा ऐसा क्या कर देंगे​? पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को क्रमशः तीन, छह और छह सीटें मिली हैं। इस दौरान उसका वोट प्रतिशत क्रमशः 13.29, 14.56 और 15 फीसदी रहा है। इनमें से केवल 2009 के चुनाव में ही सौमेन कांग्रेस में नहीं थे। इसल‌िए यह मानने की वजह नहीं है क‌ि उनकी वापसी कांग्रेस का कायाकल्प कर देगी।

कहा तो यह भी जा रहा था कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उन्हें ही बनाया जाएगा। लेकिन राहुल गांधी ने यह जिम्मेदारी रेल राज्य मंत्री अधीर रंजन चौधुरी को दी, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि 70 के सौमेन की जगह अधीर 58 के हैं, बल्कि उन्हें यह दायित्व इस कारण दिया गया है, क्योंक‌ि तृणमूल के दबदबे के बावजूद अधीर ने मुर्शिदाबाद में उसे पांव फैलाने नहीं दिया है। गौरतलब है क‌ि 1999 और 2004 में भाजपा के साथ चुनावी गठजोड़ बनाने वाली तृणमूल ने पिछला लोकसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था।

लेकिन ममता के घोर विरोधी माने जाने वाले अधीर को कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह संदेश देने की भी क‌ोशिश की है कि अव्वल तो तृणमूल से किसी तरह का गठजोड़ नहीं होगा, और होगा भी, तो उसके दबाव तले नहीं झुका जाएगा। सियालदह से सात बार विधायक रहे सौमेन राज्य स्तर पर अधीर से बड़े कद के नेता हैं।
विज्ञापन

सौमेन के चुनाव लड़ने की उम्मीद है

कभी लेफ्ट की राजनीति करने वाले अधीर को कांग्रेस में वही ले आए थे। सौमेन और अधीर की दोस्ती भी जग जाहिर है। सौमेन की वापसी पर उल्लसित अधीर ने कहा भी कि शेर वापस लौट आया है। इस लोकसभा चुनाव में अधीर के हिस्से अगर उत्तर बंगाल का अपना दुर्ग सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है, तो सौमेन कोलकाता समेत शेष इलाकों में कांग्रेस को मजबूती दिलाने का काम करेंगे।

अधीर और सौमेन की जुगलबंदी के बीच ममता के प्रत‌ि नरम रुख रखने वाले प्रदीप भट्टाचार्य और मानस भुइयां जैसे नेताओं का नेपथ्य में जाना तय है। उल्लेखनीय है क‌ि कांग्रेस ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने और 'प्राइमरी' के तहत कार्यकर्ताओं के जरिये उम्मीदवार चुने जाने की शुरुआत जिन दो लोकसभा सीटों से की है-वे हैं गुवाहाटी और उत्तर कोलकाता।

इसी उत्तर कोलकाता से सौमेन के चुनाव लड़ने की उम्मीद है। यह तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय की भी सीट है। यहां से सौमेन अगर सुदीप को पराजित करते हैं, तब आधी लड़ाई तो वैसे ही जीत लेंगे। लेकिन अगर तृणमूल और कांग्रेस में आखिरी वक्त पर गठजोड़ होता है, तब न सिर्फ लड़ाई के पैंतरे, बल्कि इन दोनों पार्टियों के निशाने भी आश्चर्यजनक रूप से बदल जाएंगे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें