राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद चले तो थे संघ परिवार से लड़ने लेकिन पड़ गए अपने परिवार के चक्कर में। बेटी मीसा भारती को पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार बनाकर उन्होंने पार्टी के एक बड़े नेता रामकृपाल यादव को खो दिया। लालू के हनुमान रामकृपाल अब लालू की बेटी के ख़िलाफ़ पाटलिपुत्र सीट से ही चुनाव लड़ेंगे। आधिकारिक घोषणा केवल बाक़ी है लेकिन रामकृपाल भाजपा में जा चुके हैं।
मार्च 10, 1990 को लालू प्रसाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। ठीक 24 साल बाद उसी तारीख़ यानी 10 मार्च को उनको दो बड़े झटके लगा। रामकृपाल ने घोषणा कर दी कि वे मीसा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ेंगे। दूसरी तरफ़ 10 मार्च को ही बिहार विधान परिषद में राजद के नेता ग़ुलाम ग़ौस ने जनता दल-यू की सदस्यता ग्रहण कर ली। उन्हें जदयू मधुबनी से अपना उम्मीदवार बनाने जा रही है।
याद रहे कि मधुबनी से बिहार विधानसभा में राजद के नेता और नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीक़ी चुनाव लड़ रहे हैं। 2009 के चुनाव में वे मौजूदा सांसद भाजपा के हुकूम देव नारायण यादव से लगभग नौ हज़ार वोटों से हार गए थे। ग़ौरतलब है कि पिछली बार कांग्रेस और राजद का गठबंधन नहीं हो सका था और कांग्रेस के महासचिव शकील अहमद भी मधुबनी सीट से मैदान में थे लेकिन वह तीसरे नंबर पर थे।
'एमवाई अलग-अलग?'
रामकृपाल और ग़ुलाम ग़ौस लालू के बहुचर्चित एमवाई समीकरण को मज़बूत कर रहे थे और लालू प्रसाद के कट्टर समर्थक माने जाते थे। दोनों दो अलग पार्टियों में चले गए हैं, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक अच्छी ख़बर ये मिली कि कोसी बेल्ट के एक बड़े नेता राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव राजद में शामिल हो गए।
पप्पू यादव मधेपुरा से राजद के उम्मीदवार होंगे। वहां से जनता दल-यू के अध्यक्ष शरद यादव सांसद हैं और इस बार भी वह यहीं से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन सवाल तो ये है कि रामकृपाल को आख़िर पार्टी क्यों छोड़नी पड़ी और मीसा के लिए लालू इस हद तक क्यों चले गए? असल ये है कि लालू के सामने नरेंद्र मोदी से बड़ी चुनौती, अदालत में चल रही लड़ाई जीतने की है।
लालू अभी ज़मानत पर हैं और अगर ऊपरी अदालत ने उनके पक्ष में फ़ैसला नहीं दिया तो वह 11 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। उन्हें लगता है कि कहीं राजद एक डूबता हुआ जहाज़ तो नहीं है। इसलिए उस तरह के नेता पार्टी छोड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढ रहे हैं। रामकृपाल को तो 2009 में भी पाटलिपुत्र से टिकट नहीं मिला था और लालू ख़ुद यहां से चुनाव लड़े थे।
'निजी कारण'
सन 2009 के लोकसभा चुनाव के वक्त रामकृपाल थोड़ा मायूस ज़रूर हुए थे लेकिन विरोध नहीं कर सके थे। बात ये है कि रामकृपाल परिसीमन से पहले पटना संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते थे। परिसीमन के बाद 2009 से इसका नक़्शा बदल गया। अब पटना साहिब और पाटलिपुत्र दो सीटें हो गईं। क़ायदे से देखा जाए तो रामकृपाल पटना साहिब से उम्मीदवार हो सकते थे।
लेकिन 2009 में चुनावी समझौते में ये सीट रामविलास पासवान की एलजेपी को मिल गई जबकि इस बार वो सीट कांग्रेस के पास चली गई है। मजबूरी में रामकृपाल को फिर पाटलिपुत्र की तरफ़ देखना पड़ा। लालू के साथ मसला ये है कि वह सारण सीट से राबड़ी देवी की जीत को लेकर बहुत ज़्यादा आश्वस्त नहीं हैं क्योंकि वहां से भाजपा के राजीव प्रताप रूड़ी एक सशक्त दावेदार हैं।
इसलिए अगर राबड़ी चुनाव हार जाती हैं और मीसा भी चुनाव नहीं लड़ती हैं तो लालू यादव के लिए दिल्ली में कोई ठिकाना नहीं बचेगा। बिहार में तो उनका सफ़ाया हो ही चुका है। वह किसी तरह से राबड़ी देवी को बिहार विधान परिषद में भेज पाए थे। अगर दिल्ली में उनका कोई ठिकाना नहीं रहेगा तो फिर राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पकड़ और कम हो जाएगी।
मीसा का है पाटलिपुत्र कनेक्शन
लालू के बड़े बेटे की राजनीति में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है और छोटे बेटे अभी 25 साल के नहीं हुए हैं, इसीलिए उन्होंने मीसा को पार्टी का उम्मीदवार बनाया। मीसा का जन्म भी पाटलिपुत्र में ही हुआ था और उनकी शादी भी पाटलिपुत्र के ही एक परिवार में हुई है।
लेकिन लालू शायद ये नहीं समझ पाए कि ये 1997 नहीं है जब चारा घोटाले मामले में जेल जाने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। लालू अब एक कमज़ोर विपक्षी नेता हैं, मुख्यमंत्री नहीं। एक बात ये भी है कि दोनों नेताओं क़ा जाना कहीं इस बात का संकेत तो नहीं कि एम और वाई दोनों विपरीत दिशा में जाने की तैयारी कर रहे हैं?
लालू को एक बात शायद थोड़ी राहत दे कि ये दोनों ही नेता पटना के ही आस-पास पहचाने जाते हैं, पूरे बिहार में उनकी राजनीतिक पहचान नहीं है।