मशहूर अभिनेत्री और रंगमंच कर्मी जोहरा सहगल अब हमारे बीच नहीं हैं। थियेटर से लेकर फिल्मी दुनिया में अपने अभिनय की छाप छोड़ने वाली जोहरा का जन्म सहारनपुर में ढोली खाल के पास मोहल्ला दाऊद सराय में 27 अप्रैल 1912 को पठान मुस्लिम परिवार में हुआ था।
उनके बचपन का नाम साहेबजादी जोहरा बेगम मुमताज उल्ला खान था। उनके पिता मुमताज उल्ला खान और नातिका उल्ला खान उतर प्रदेश के रामपुर निवासी थे।
सात बच्चों में तीसरे नंबर की जोहरा बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा वाली थीं, लेकिन अपनी रुचि के अनुसार नृत्य और रंगमंच में 14 साल तक सक्रिय रहने के बाद उनकी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक का सफर फिल्मी दुनिया के नाम रहा। वह अकेली ऐसी शख्स रहीं, जिन्होंने पृथ्वीराज कपूर, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर नए जमाने के अभिनेता रणबीर कपूर तक के साथ अभिनय कर छाप छोड़ी। इस हस्ती के अब न रहने से शहर में कलाकारों से लेकर प्रशंसक तक गमगीन हैं।
जोहरा एक : किस्से अनेक
ढोली खाल में ही रहने वाले वरिष्ठ रंगमंच कर्मी जावेद खान सरोहा और सरदार अनवर बताते हैं कि जोहरा के मामले में सबसे खास बात यही है कि उनमें अभिनय के प्रति बहुच जुनून था। यहां का बच्चा भी उनके नाम को जानता है, लेकिन शहर के नसीब में जोहरा जी की झलक पानी नहीं थी। इसलिए कॅरियर के इतने लंबे समय में भी वे पता नहीं क्यों यहां के लिए वक्त नहीं निकाल पाईं और सहारनपुर उनकी झलक पाने को बेताब ही रह गया।
जोहरा सहगल के मामले में यह भी कम रोचक नहीं है कि ढोली खाल से लेकर शहर के अन्य स्थानों के लोगों के बीच उनके बारे में कई किस्से सुनने को मिलते हैं। रंगमंच कलाकार बताते हैं कि सहारनपुर में उनका बचपन बहुत कम समय के लिए रहा। मशहूर शास्त्रीय नृतक उदय शंकर से नृत्य की बारीकियां सीखने के साथ ही उनके माध्यम से वह इंदौर के नृतक एवं चित्रकार कामेश्वर सहगल से मिलीं। बताते हैं कि 14 अगस्त 1942 को उनकी शादी हुई।
रंगकर्मी सरदार अनवर कहते हैं कि उनके बड़े बुजुर्गों की जुबानी माने तो पंडित जवाहर लाल नेहरू भी इस शादी में शरीक हुए थे। अफजल कुरैशी, अरशद और कुछ अन्य लोगों का कहना है कि जोहरा के बचपन और शादी के बारे में तो कुछ बताना मुश्किल है। इतना जरूर है कि वे अपने काम के प्रति बेहद जुनूनी और अन्य कलाकारों से कहीं अधिक सक्रिय थीं।
जोहरा ने बढ़ाया कई रंगकर्मियों को हौसला
रंगमंच की दुनिया में सहारनपुर का नाम शान से लिया जाता है। माना जाता है कि जोहरा सहगल की कड़ी मेहनत और रंगमंच को नया मुकाम देने के जुनून के कारण ही यहां के कई कलाकारों को इस विधा में निखरने का मौका मिला। शहर में कई रंगमंच कलाकार नए मंचों पर जलवे बिखेर रहे हैं। इनमें जावेद खान सरोहा, सरदार अनवर, विजेश जोशी, अशोक वर्मा, विक्रांत से लेकर कई नाम शामिल हैं।
‘दादी’ में दिखती थी ‘बच्ची’ की झलक
जोहरा सहगल के प्रशंसक मानते हैं वह रंगमंच की दादी थीं, लेकिन उनके बोलने के अंदाज, चेहरे के हावभाव और मसखरे अंदाज के कारण उन्हें कुछ लोग बड़ी उम्र की बच्ची भी कहते थे। अपने काम के जुनून के कारण ही उनके आगे बढ़ती उम्र छोटी होती चली गई। उन्होंने कब अभिनय की दुनिया में 60 साल गुजार दिए, इसका पता ही नहीं चला। यही वजह रही कि 1946 में ‘धरती के लाल’ से लेकर 2007 में ‘सांवरिया’ तक कई पीढ़ियों के कलाकारों के साथ उन्होंने अभिनय किया।
दून की कचहरी में की थी जोहरा ने शादी
मशहूर अभिनेत्री जोहरा सहगल दून से पुराना नाता रहा है। खास बात यह है उनकी शादी भी दून स्थित कचहरी में ही हुई थी। अल्मोड़ा में मशहूर कलाकार उदय शंकर की एकेडमी में नृत्य के दौरान ही उनकी मुलाकात कामेश्वर सहगल से हुई और दोनों के बीच प्यार हो गया।
फिल्मों के जानकार और दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर से जुड़े मनोज पंजवानी ने बताया कि जोहरा ने यूरोप में उदय शंकर की एकेडमी से थियेटर की भी ट्रेनिंग ली। इसके बाद वह उदय शंकर के ग्रुप से जुड़ गई। उदय शंकर ने अल्मोड़ा में अपनी एकेडमी खोली। जोहरा यहीं नृत्य सिखाने लगी। तब कामेश्वर सहगल इनसे नृत्य सीखने आते थे और इसी दौरान दोनों में प्यार हो गया। पांच साल यहां नृत्य सिखाने के बाद वह मुंबई चली गईं। फिर वहां इन्होंने पांच साल तक नृत्य-निर्देशन की दिशा में काम किया।
जोहरा सहगल अक्सर बचपन में दून आया करती थीं। जानकार बताते हैं कि यहां चकराता में उनका पुश्तैनी मकान था। जहां वह छुट्टियां बिताने आया करती थीं। वह अक्सर पेड़ पर चढ़ जाया करती थीं और खूब शरारतें किया करती थी। हालांकि उनका जन्म 27 अप्रैल, 1912 को सहारनपुर में हुआ था। रोहिल्ला पठान मुमताजउल्लाह खान की वह सातवीं संतान थीं। उनके मामा साहेबजादा सइदुज्जफर खान रामपुर से ताल्लुक रखते थे, जिनका परिवार बाद में देहरादून में रहने लगा था। वह यूके से मेडिसिन की पढ़ाई कर रहे थे, जब उन्होंने उन्हें एक ब्रिटिश एक्टर के सानिध्य में अप्रेंटिस करने को कहा। रहा करते थे। यूनाइटेड नेशंस पापुलेशन फंड ने उन्हें ‘लाडली आफ द सेंचुरी अवार्ड’ से भी नवाजा।
वेल्हम गर्ल्स जिस जगह, वहां था ‘नसरीन’
वेल्हम गर्ल्स स्कूल जिस जगह पर है, वहीं जोहरा सहगल के मामा का घर नसरीन था। वह इसी जगह अपने रिश्ते के भाई-बहनों के साथ छुट्टियां बिताने आया करती थीं।
जोहरा ने अल्मोड़ा में भी सीखे थे अभिनय के गुर
मशहूर अभिनेत्री और नृत्यांगना जोहरा सहगल का अल्मोड़ा से भी गहरा जुड़ाव रहा था। युवावस्था में उन्होंने अल्मोड़ा में ही नाट्य कला के गुर सीखे। वह प्रसिद्ध नृत्य सम्राट उदयशंकर के साथ अल्मोड़ा आई थी। वर्ष 1938 से 1944 के बीच वह अल्मोड़ा आती रहीं। उदयशंकर की सिमतोला में स्थापित उदय शंकर इंडियन कल्चरल सेंटर की वह विद्यार्थी और बाद में शिक्षिका रहीं। वह सेंटर में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में भी प्रतिभाग करती थी। वह बैले ग्रुप से भी जुड़ी रहीं। उदयशंकर द्वारा बनाई गई एकमात्र फिल्म कल्पना में भी जोहरा सहगल ने अभिनय किया। जिसका फिल्मांकन मद्रास में हुआ था।
उदयशंकर के साथ जोहरा सहगल सर्वप्रथम 1938 में अल्मोड़ा आई। उदयशंकर द्वारायहां धार की तूनी (सिमतोला) 1938 में उदयशंकर इंडियन कल्चरल सेंटर स्थापित किया गया था। जोहरा सहगल ने इस सेंटर में नृत्य और अभिनय के गुर सीखे। शुरू वह इस सेंटर की विद्यार्थी रही। नृत्य और अभिनय में पारंगत होने के बाद उन्होंने स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण भी दिया। वह उदयशंकर द्वारा बनाए गए बैले ग्रुप की भी वह सदस्य रही। इस केंद्र में जोहरा सहगल के अलावा गुरुदत्त, शांति वर्धन, अमला, प्रभात गांगुली, रुमा गुहा ठकुराता, प्रभात गांगुली, उजरा, लक्ष्मी शंकर, शांति गांधी जैसे कलाकार भी अल्मोड़ा पहुंचे थे। आर्थिक दिक्कतों के चलते 1942 में यह केंद्र बंद हो गया। इसके बाद भी जोहरा सहगल 1944 तक अल्मोड़ा आती रहीं।
लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब के 68 वर्षीय वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिभुवन गिरि महाराज बताते हैं कि जोहरा सहगल अल्मोड़ा आने के बाद यहां की सांस्कृतिक गतिविधियों में रच बस गई थी। उन्होंने यहां की रामलीला, कुमाउंनी नृत्य घस्यारी, देवी पूजा आदि सांस्कृतिक गतिविधियों में भी भाग लिया।