सुप्रीम कोर्ट के आईटी एक्ट से धारा 66ए को खत्म करने के निर्णय का सोशल मीडिया ने जमकर स्वागत किया है। वहीं सोशल मीडिया पर ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि इस कानून के खत्म होने के बाद सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा का प्रयोग और महिलाओं या व्यक्ति विशेष से लोग बेहुदे ढंग से पेश आ सकते हैं।
गौरतलब है अभी तक आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत सोशल मीडिया साइट, मोबाइल या अन्य टेक्निकल डिवाइसेज से किसी के बारे में आपत्तिजनक लिखने या फिर मानहानि करने पर पर उसके खिलाफ पुलिस कार्रवाई करती थी। पर सुप्रीम कोर्ट ने धारा 66ए को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में खलल माना है। साथ ही इसे तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सिद्घार्थ सिंह लिखते हैं कि बाल ठाकरे की शवयात्रा मुबंई में ट्रैफिक जाम का प्रमुख कारण था। आजम खान की भैंसे मूर्ख हैं। साथ ही अब कपिल सिब्बल का क्या होगा?
मेटल ड्यू नाम से एकाउंट चलाने वाले अमर लिखते हैं कि आज धारा 66ए पर अर्णब गोस्वामी का मुकाबला कौन करेगा? क्या किसी में है हिम्मत?
ह्यूमरस इंडियन नाम से एकाउंट चलाने वाली एवरग्रीन श्वेता लिखती हैं कि राहुल गांधी खुश हैं कि इस कानून को खत्म कर दिया गया है। अब उनको लग रहा है कि उनके मां-बेटे वाले चुटकुले और ज्यादा लिखे जा सकेंगे।
आदर्श राज ठाकरे लिखते हैं कि धारा66 ए जैसी गेंद पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ऐसा शॉट मारा है कि अब गेंद मिल ही नहीं रही है।
अनुपम सिंह लिखते हैं कि धारा 66ए को सुप्रीम कोर्ट ने सजा-ए-मौत दे दी है। अब ये कभी सांस नहीं ले पाएगा।
सभी टीवी चैनल वाले एक ऐसे आदमी को ढूंढ रहे हैं जो यह कह दे कि धारा 66 ए का वह समर्थन करता है। इसके बाद उस आदमी धज्जियां उड़ाई जाएंगी।
सोशल मीडिया साइट पर पत्रकार से उद्यमी तक का सफर तय करने वाली स्मिता देशमुख लिखती हैं कि इस कानून को तो खत्म कर दिया गया है। पर ट्विटर एकाउंट पर ऐसे लोगों के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा जो महिलाओं को गाली बकते हैं। साथ ही किसी के चरित्र पर हमला करने के साथ-साथ उस पर निजी हमला करते हैं।
ट्विटर पर कश्मीरी एप्पल नाम से एकाउंट से लिखा गया है कि सरकार या निर्णय नहीं कर सकती है कि हम क्या देखें, क्या सुनें और क्या कहें। अगर कोई सरकार ऐसा निर्णय करती है इससे अच्छा है कि हमे लोग मरे हुए ही बेहतर हैं। आज का फैसला हमारे हक में है।
ट्विटर एकाउंट पर सागर सिंह लिखते हैं कि इस कानून को खत्म करने के बाद सरकार को फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे फिल्म और बीफ पर से भी प्रतिबंध वापस ले लेना चाहिए था।
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि इस कानून के जरिए कई लोगों को बेवजह अपराधी बना दिया गया।
फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब यह नहीं है कि कुछ भी लिख दें। आईटी एक्ट की धारा 66ए पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपके जोश और उत्साह का मैं आदर करता हूं। लेकिन मीडिया स्टूडेंट और प्रशिक्षक के नाते यह भी बता दूं कि फालतू का जोखिम मत लीजिएगा।
एक्ट ऑफ डिफेमेशन, आईपीसी 499, सद्भाव बिगाड़ने पर लगने वाली धारा 153 ए, धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर लगने वाली धारा 295ए, और सीआरपीसी 95ए, अश्लीलता से संबंधित धारा 292... ये सब अपनी जगह मौजूद हैं। कंटेप्ट ऑफ कोर्ट और पार्लियामेंटरी प्रिवेलेज के प्रावधान खत्म नहीं हो गए हैं। और फिर भारतीय संविधान का 19 (1) (1) भी तो है, जिसके तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 6 तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। इसलिए लिखिए, लेकिन जोखिम को समझते हुए। कानून की जानकारी न होना कोई डिफेंस नहीं है।
फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट देता है तो थप्पर फाड़ के देता है।
फेसबुक पर बिलाल जाफरी लिखते हैं कि धारा 66 ए निरस्त होते ही ऐसी ख़ुशी आई है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर की जो लोग जानते तक नही थे इसके बारे में वो तक बावले हो गये है, जैसे वो, जो फ़ेसबुक पर सिर्फ़ और सिर्फ़ कैन्डी क्रश के गुप्त एम्बेसडर है, वो तक लिख दिये है-"हैप्पी 66ए दिवस।
अरूण जैन ने फेसबुक पर लिखा है कि अमित शाह ने खिसियाते हुए कहा है कि धारा 66 ए तो जुमला थी।
श्रवण सिंह राजपूत लिखते हैं कि संजय झा कर चुके। मनीष तिवारी कर रहे हैं। उम्मीद है जल्द ही कपिल सिब्बल भी #66A की बुराई करेंगे।