कर्नाटक में हार के साथ ही दक्षिण भारत में भाजपा का एकमात्र किला ढह गया। हालांकि पार्टी को इस हार का अंदेशा पहले से था।
बीएस येदियुरप्पा के अलग पार्टी बनाने के बाद से ही भाजपा ये मान चुकी थी कि कर्नाटक में अब लौटना मुश्किल है। हालांकि येदियुरप्पा के अलावा भी कई ऐसी वजहें रहीं, जिनसे भाजपा को कर्नाटक में नुकसान हुआ।
कारण 1: येदियुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई में देरी
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा केंद्र के खिलाफ लगातार हमलावर रही लेकिन जब येदियुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तो भाजपा ने कार्रवाई में जरा भी जल्दबाजी नहीं दिखाई।
नवंबर, 2010 में येदियुरप्पा पर भूमि आवंटन और खनन घोटाले के आरोप लगे।
कर्नाटक लोकायुक्त ने अपनी जांच रिपोर्ट में उन पर लगे आरोपों को सही भी पाया। हालांकि पार्टी नेतृत्व उनके खिलाफ कार्रवाई करने से बचता रहा।
इस मुद्दे पर शीर्ष नेतृत्व में कभी आम सहमति नहीं रही। पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं के दबाव के कारण ही लगभग 9 महीने बाद येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा।
वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश के मुताबिक, येदियुरप्पा के मसले पर भाजपा द्वारा बरती गई लापरवाही से उसे राजनीतिक नुकसान हुआ।
उन्हें मुख्यमंत्री पद से बहुत देर हटाया गया और पार्टी को तब तक जितना नुकसान होना था, वह हो गया था।
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कारण 2: हिंदुत्व के बजाय जाति
भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में कर्नाटक में हिंदुत्व के बजाय जाति पर फोकस करना ज्यादा मुनासिब समझा।
कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय शुरुआत से ही राजनीतिक रूप से सश्ाक्त रहे। भाजपा ने पिछले चुनावों में इन दोनों समुदायों के गठजोड़ से ही सत्ता पाई थी।
येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से थे। भाजपा ने पिछले चुनाव में लिंगायत वोटों के लिए येदियुरप्पा को आगे बढ़ाया।
वोक्कालिगा समुदाय के वोटों के लिए पार्टी ने सदानंद गौड़ा जैसे नेताओं का आगे रखा।
लेकिन येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री पद से हटने और सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री पद से हटा देने के कारण भाजपा ने कर्नाटक में इन दोनों समुदायों का वोट गंवा दिया।
केजी सुरेश के मुताबिक, इन्हीं दोनों समुदायों पर फोकस करने के कारण दूसरे जातियों के नेता भाजपा से नाराज हो गए और उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया।
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कारण 3: भ्रष्टाचार का मुद्दा
भाजपा ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। केंद्र में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस को घेरेने के लिए भाजपा को ये एक आसान मुद्दा लगा।
लेकिन कर्नाटक में भ्रष्टाचार का मुद्दा भाजपा पर ही भारी पड़ गया। येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही हटा चुकी पार्टी यहां कांग्रेस के खिलाफ मजबूती से खड़ी नहीं हो पाई।
नतीजतन कांग्रेस उसे ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने में कामयाब रही।
भाजपा ने कर्नाटक में उन मुद्दों को तलाश नहीं सकी, जो इसे यहां जीत दिला सकते थे।
कारण 4: अस्थिरता
कर्नाटक में भाजपा के पांच साल के शासन में अस्थिरता बनी रही। पार्टी ने प्रदेश में पांच सालों में तीन मुख्यमंत्री बदले।
येदियुरप्पा को भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोपों में हटाया। उनके बाद आए सदानंद गौड़ा को पार्टी ने येदियुरप्पा के दबाव में हटाया।
गौड़ा के बाद मुख्यमंत्री बने जगदीश शेट्टार भी पार्टी की गुटबाजी से परेशान रहे। इनके कार्यकाल में ही भाजपा के कई विधायक नवगठित केजेपी में शामिल हो गए।
जगदीश शेट्टार अपनी सरकार बनाने के लिए ही जूझते रहे।
कारण 5: मोदी पर निर्भरता
भाजपा ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों मे मुद्दों के साथ चुनाव प्रचार में कमजोर रणनीति
अपनाई।
पार्टी ने स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं पर भरोसा जताने के बजाय, इन चुनावों को भी राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी बनाने की कोशिश की।
हालांकि मोदी ने वहां चुनाव रैलियां अधिक तो नहीं की लेकिन पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में मोदी ही बने रहे। पार्टी को कर्नाटक में इस रणनीति का नुकसान हुआ।
कारण 6: गवर्नेंस
भाजपा कर्नाटक में सुशासन देने में भी नाकामयाब रही। केजी सुरेश के मुताबिक, 2008 में पार्टी ने जब राज्य की बागडोर संभाली थी, बंगलौर की छवि गार्डेन सिटी की थी लेकिन आज इस शहर की छवि गार्बेज सिटी की है।
सुशासन के दावे के बाद भी भाजपा राज्य में सुशासन का भरोसा दिलाने में नाकामयाब रही।