छह महीने का अंतराल किसी भी प्रधानमंत्री के मूल्यांकन के लिए पर्याप्त हो सकता है? बहुमत की सरकार केंद्र में हो तो संभवतः जवाब होगा, 'नहीं'।
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पिछले छह महीने का कार्यकाल ऐसा रहा कि मानो लगातार उन्हें जवाबतलब किया जाता रहा हो और वे सफाई देते रहे हों। ऐसे हालात तब रहे जब सरकार का संसद में मजबूत विपक्ष से सामना नहीं था, और संसद से बाहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंधी चल रही थी।
रोचक बात यह भी रही कि छह महीने के अंतराल में प्रधानमंत्री मोदी भी 'नरेंद्र मोदी' के रूप में कम दिखे। उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू की आर्थिक नीतियों की आलोचना की लेकिन प्रधान सेवक बनने की कोशिश उन्ही की शैली में की। सरदार वल्लभ भाई पटेल की छवि भी ओढ़ी।
आर्थिक एजेंडे पर कमजोर पड़ते दिखे तो महात्मा गांधी की विरासत की ध्वजा उठा ली। हालांकि जानकारों ने कहा कि मोदी गांधी, नेहरू या पटेल बनने की कोशिश करते रहे, लेकिन छह महीने के अंतराल में वह राजीव गांधी के अधिक करीब दिखे।
कैसी रहेगी मोदी और राजीव की तुलना?
संभवतः नरेंद्र मोदी को ये तुलना पसंद भी ना आए। छह महीनों के कार्यकाल में उन्होंने राजीव गांधी को अनदेखा किया। लेकिन विदेश नीति के मुद्दे पर जैसी रुचि उन्होंने दिखाई, वह बिलकुल वैसी ही थी, जैसी राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद दिखाई थी।
उन्होंने तकनीकी और वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए वैसा ही मोह दिखाया, जैसा राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में दिखाया था। पिछले छह महीने में भारतीय मध्य वर्ग ने नरेंद्र मोदी का वैसे ही सिर आंखों पर बिठाया, जैसे उसने तीन दशक पहले राजीव गांधी को बैठाया था।
जानकारों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बनी, जिससे देश को नई ऊंचाई पर ले जाने की उम्मीद बांध ली गई। अपने शीर्ष पर राजीव गांधी की छवि भी ऐसी ही थी। युवा प्रधानमंत्री, जिसके पास भारत को विकसित देश बनाने का माद्दा है।
मोदी ने उठा रखा है राजीव का झंडा?
मिस्टर क्लीन राजीव गांधी की एक-एक बात समर्थक वैसे ही लहालोट थे जैसे आज मोदी पर हैं। राष्ट्रीय सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी राजीव ने सम्मान बटोरा। भारत और पड़ोसी मुल्कों को एक मंच पर लाकर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की नींव राजीव गांधी के कार्यकाल में ही रखी गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काठमांडू में सार्क देशों के सम्मेलन में क्षेत्रीय सहयोग की राजीव गांधी की उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर भारत और पाकिस्तान के संबंधों के चेप्टर की शुरुआत की कोशिश की थी।
हालांकि पाकिस्तान ने उस कोशिश की भ्रूण हत्या कर दी। पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी की गई। पाकिस्तान ने भारत के साथ बातचीत को बजाय कश्मीरी अलगाववादियों को अधिक तवज्जो दी। नतीजतन भारत ने उससे बातचीत बंद कर दी।
थोड़ी जल्दबाजी है मोदी का आंकलन
राजीव गांधी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के राजनीतिक रिश्तों के कारण ही भारत और पाकिस्तान के बीच नॉन न्यूक्लियर पैक्ट हो सका। 1985 में राजीव की अमेरिका यात्रा बहुत ही सफल रही थी। उस यात्रा के बाद भारत को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताकत मिली।
घरेलू स्तर पर राजीव ने संत हरचरण लोंगोवाल से समझौता किया। उन्होंने असम और मिजोरम में अलगाववादी आंदोलन को खत्म करने की दिशा में सार्थक कोशिश की। राजीव ने भ्रष्टाचार और बिचौलियों पर उतना ही तल्ख हमना किया जैसा आज मोदी करते हैं।
हालांकि बाद में भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ही राजीव गांधी को हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में छह महीने में प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल का आंकलन करना जल्दबाजी ही कहलाएगा।