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टीवी पत्रकार के आरोपों पर मीडिया की चुप्पी

Thu, 03 Jul 2014 01:35 PM IST
दिव्या आर्य/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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दिल्ली से सटे नोएडा में एक टीवी एंकर की दफ्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश वैसी सुर्खी नहीं बन सकी, जैसा कि ऐसे दूसरे मामलों में बनती है। टीवी एंकर तनु शर्मा ने अपने एम्प्लॉयर पर प्रताडना का आरोप लगाया है, और इंडिया टीवी ने उन पर काम में कोताही का।
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इस मामले में पुलिस केस दोनों तरफ से दर्ज हुए हैं। इसकी मीडिया को ‘खबर’ तो है पर ‘कवरेज’ नहीं। समाचार चैनलों के दफ्तरों के आसपास चाय-सुट्टा के अड्डों पर मीडियाकर्मियों की बातचीत में जरूर इसका जिक्र है, कहीं बेबसी के साथ, कहीं गुस्से और कहीं अविश्वास के साथ।

इस मामले के बारे में इसके अलावा कहीं कोई बात चल रही है, तो वह सोशल मीडिया और मीडिया पर नजर रखने वाली वेबसाइट्स पर है। दो एक अंग्रेजी अखबारों ने जरूर इस मामले को छापा।
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मीडिया में काम की जगह पर प्रताडना के आरोपों से जुडा ये पहला मामला नहीं है। पर तहलका मैगजीन के संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ यौन हिंसा के आरोप को छोड दें, तो इससे पहले भी, मीडिया की मुख्यधारा ने अपने ही कर्मियों के साथ प्रताडना के किसी अन्य मामले को खबरों में जगह नहीं दी है।

तनु शर्मा बनाम इंडिया टीवी

उत्तर प्रदेश पुलिस के मुताबिक इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने 22 जून को चैनल के दफ्तर के आगे जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। फेसबुक पर एक गुबार भरा स्टेटस लिखने के बाद।

दफ्तर के लोगों और पुलिस ने ही उन्हें वक्त रहते अस्पताल पंहुचाया। तनु बच गईं। अगले दिन घर लौटने पर पुलिस को दिए अपने बयान में तनु ने कहा कि इंडिया टीवी की एक वरिष्ठ सहयोगी ने उन्हें “राजनेताओं और कॉरपोरेट जगत के बडे लोगों को मिलने” और “गलत काम करने को बार-बार कहा”। तनु के मुताबिक, “इन अश्लील प्रस्तावों के लिए मना करने के कारण मुझे परेशान किया जाने लगा, इसकी शिकायत एक और सीनियर से की तो उन्होंने भी मदद नहीं की, बल्कि कहा कि ये प्रस्ताव सही हैं”। यह बात भी गौर करने लायक है कि तनु ने जिन दो वरिष्ठ कर्मियों पर आरोप लगाया है, उनमें से एक महिला है।

तनु का आरोप है कि परेशान होकर उन्होंने एसएमएस के जरिए अपने बॉस को लिखा, “मैं इस्तीफा दे रही हूं”, और कंपनी ने इसे औपचारिक इस्तीफा मान लिया, और “इस सबसे मैं जहर खाने पर मजबूर हुई”।

इंडिया टीवी ने तनु के आरोपों को बेबुनियाद बताता है। बीबीसी को भेजे एक लिखित जवाब में इंडिया टीवी ने अपने वकील की मार्फत कहा है- “तनु ने चार महीने पहले इस चैनल में नौकरी की और वो शुरुआत से ही अपने काम में लापरवाही बरतती रहीं, इसके बारे में उन्हें समझाया गया तो अब वो उन्हीं वरिष्ठकर्मियों को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही हैं।” इंडिया टीवी ने बीबीसी हिंदी को इस तरह के “गैरकानूनी आरोपों” को प्लेटफॉर्म देने से बचने की हिदायत भी दी।

इंडिया टीवी ने बीबीसी के सवालों के जवाब में कहा, “तनु के बर्ताव को देखते हुए उनके इस्तीफे को मंजूर करने में हमें कोई झिझक नहीं थी, और उनके कॉन्ट्रैक्ट में इस्तीफा देने के किसी एक माध्यम की चर्चा भी नहीं है, इसलिए हमें एसएमएस भी मंजूर है।”

फिलहाल मीडिया की सुर्खियों से बाहर पुलिस मामले की तहकीकात कर रही है।

मीडिया उद्योग में महिलाओं को खतरा?

साल 2013 में ‘इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट’ और ‘इंटरनेशनल वीमेन्स मीडिया फाउंडेशन’ ने दुनियाभर की 875 महिला पत्रकारों के साथ सर्वे किया।

सर्वे के मुताबिक करीब दो-तिहाई महिला मीडियाकर्मियों ने काम के सिलसिले में धमकी और बदसुलूकी झेली है। ज्यादातर मामलों में जिम्मेदार पुरुष सहकर्मी थे।

वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलीपोज के मुताबिक भारत में ये खतरा कहीं ज्यादा है। पामेला कहती हैं, “इसके बारे में चर्चा ही नहीं होती, क्योंकि खुद पत्रकार ही इस मुद्दे को उठाने से डरते हैं और ये चुप्पी मीडिया कंपनियों और उनके कर्मियों के बीच के असमान रिश्ते को दर्शाती है।”

प्रिंट मीडिया को नियमित करने के लिए 1978 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी। पर इससे बिल्कुल अलग, टीवी मीडिया में जब तेजी से विस्तार हुआ तो साथ-साथ उसमें काम करनेवाले लोगों के लिए कोई कानून या नियम नहीं बनाए गए। पामेला के मुताबिक वो ऐसे कायदे बनाने में किसी की रुचि भी नहीं देखती हैं।

टेलीविजन पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए हाल ही में ‘ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन’ बनाई गई लेकिन इस संगठन ने भी तनु शर्मा के मामले में अभी तक अपनी कोई राय जाहिर नहीं की है। न ही संपादकों के संगठन ‘एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की ओर से इस विषय पर कोई बयान आया है।

न्यूज चैनल या अपनी जागीर?

तनु शर्मा के आरोपों के सामने आने के बाद दिल्ली में पत्रकारों के संगठन ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ और महिला पत्रकारों के संगठन ‘इंडियन वीमेन्स प्रेस कोर’ ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता की और कहा कि, “ये मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि मीडिया संस्थानों में युवा महिला पत्रकार ऐसे माहौल में काम कर रही हैं जो अच्छे नहीं कहे जा सकते।”

इसी वार्ता में बुलाए गए वरिष्ठ पत्रकारों में से एक, सीएनएन-आईबीएन/आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर, विनय तिवारी ने कहा कि टीवी न्यूज चैनलों में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे कई लोग, “उन जगहों को सामन्ती विचारधारा के तहत अपनी जागीर की तरह चला रहे हैं।”

विनय तिवारी के मुताबिक पत्रकारिता जगत की दिकत प्रोसेस और परसेप्शन के फर्क में हैं। क्योंकि कोई ठोस और यूनीफॉर्म प्रक्रिया भारतीय चैनलों में नहीं है, जिसकी समझ में जैसे आता है, चैनल चलाता है।

उन्होंने कहा, “ये समझ बहुत व्यक्तिगत होती है, इसलिए जो लोग फैसले करने की भूमिका में हैं, उनके हाथ में बहुत ताकत है। उस ताकत का गलत इस्तेमाल होने की गुंजाइश बढ जाती है।“

ये ताकत महिला ही नहीं पुरुष पत्रकारों के खिलाफ भी अक्सर इस्तेमाल होती है।
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टीवी-अखबार संगठनों के सामने अकेले खड़े हैं पत्रकार

चौबीस घंटे दुनियाभर की खबरों को तेजी से प्रसारित करने की जरूरत के चलते टीवी न्यूज चैनलों में काम करने के तौर तरीके मुश्किल माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू ने भारतीय चैनलों में सालों काम करने के बाद एक उपन्यास भी लिखा है। शुंगलू के मुताबिक आम जनता की नजर में न्यूज चैनलों के प्रति बहुत इज्जत और विश्वास होता है और प्रताडना के आरोप उसे धूमिल करने की शक्ति रखते हैं।

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “कहीं ना कहीं टीवी न्यूज चैनलों में एकजुटता दिखती है, जिसके तहत वो एक-दूसरे के बारे में ऐसे आरोप या वारदातों को सामने नहीं लाना चाहते, ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज करने की एक अनकही सहमति दिखती है।”

अमरीका, ब्रिटेन जैसे अन्य देशों में आज भी पत्रकारों की प्रभावी यूनियन काम कर रही हैं। पर भारत में प्रेस मीडिया के अलावा रेडियो, टीवी जैसे नए माध्यमों में कोई पत्रकार संघ नहीं है।

दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स की अध्यक्ष सुजाता मधोक के मुताबिक इस वजह से टीवी पत्रकार बिल्कुल अकेले पड जाते हैं, “जब आपका साथ देने के लिए कोई आपके साथ नहीं खडा है, तो आप अपने हक या समाज के हक के लिए कैसे लड सकते हैं?”

साथ ही वो मानती हैं कि कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी के चलन ने मौजूदा संघ को भी कमजोर किया है।

सुजाता कहती हैं कि तनु शर्मा के मामले में किसकी गलती है ये फैसला अभी नहीं सुनाया जा सकता लेकिन ऐसी घटना अगर किसी और कंपनी में होती तो उसको सामने लाने में मीडिया ही आगे होती।

उनके मुताबिक, “मीडिया में ऐसी सांठ-गांठ है कि एक-दूसरे पर वो निशाना नहीं साधते, एकदम चुप्पी इसी वजह से है।”

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी एक सहकर्मी के साथ यौन हिंसा करने का आरोप है।
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