वाकया 1984 में इलाहाबाद चुनाव का है। हेमवती नंदन बहुगुणा समर्थकों की भीड़ के साथ शहर में प्रचार को निकले थे। अचानक कांग्रेस प्रत्याशी अमिताभ बच्चन से सामना हो गया। दोनों में अभिवादन हुआ फिर अपने-अपने रास्तों पर मुड़ गए। पर खास यह रहा कि बहुगुणा के साथ चल रही भीड़ ने उनका साथ छोड़ दिया और अमिताभ के काफिले के साथ हो ली।
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बहुगुणा नजारा देखते रहे। बौद्धिकता और गरिमा वाले इस शहर में लाज और संकोच के बंधन भी टूटे थे। जिन सड़कों से अमिताभ गुजरने वाले होते वहां दुपट्टे बिछ जाते थे। दरअसल सियासत ने पहली बार फिल्मी ग्लैमर का तूफान देखा था।
उसके बाद यूपी की सियासत मायानगरी से अपना नाता जोड़ने में कभी हिचकी नहीं। इस बार भी। कान्हा की नगरी मथुरा से लेकर मेरठ और पूर्वांचल में जौनपुर तक इन सितारों की धूम है। कौन हारेगा और कौन जीतेगा, यह भविष्य बताएगा पर भीड़ खींचने में कोई किसी से कम नहीं। मनोज श्रीवास्तव की रिपोर्ट-
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सियासत में ड्रीमगर्ल
ड्रीमगर्ल का भाजपा से पुराना नाता है। राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। इस बार जाट बहुल मथुरा सीट पर चौधरी अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी के लिए चुनौती बन कर उभरी हैं। जाट बहुल सीट इसलिए चुनी गई कि उनके अभिनेता पति ध्ार्मेंद्र जाट बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं।
धर्मेन्द्र ने भी एक बार जाट बहुल बीकानेर से चुनाव लड़ा था। हेमा फिलहाल अपने चुनाव में भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के अलावा मोदी राग अलाप रही हैं। खुद को कृष्ण की दीवानी बताकर चुनाव मैदान में उतरीं हेमा का पूर्व सांसद तेजवीर सिंह के समर्थक बाहरी कहकर विरोध कर रहे हैं। तर्क दे रहे हैं कि जैसे जीतने के बाद धर्मेन्द्र बीकानेर नहीं गए थे, वैसे यह भी मथुरा नहीं आएंगी।
हेमामालिनी अब अपनी पार्टी भाजपा से मथुरा से उंमीदवार हैं जिनके लिए मोदी फैक्टर व फिल्मी प्रसिध्द प्लस प्वाइंट है। हालांकि उन्होंने स्थानीय लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है।
जयाप्रदा की राजनीति
राजनीतिक कॅरिअर की शुरुआत चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली पार्टी तेलुगुदेशम से हुई थी। फिर अमर सिंह के जरिये सपा में सक्रिय हुईं और रामपुर से सांसद भी बनीं। आजम खां से मतभेदों के चलते सपा से किनारा भी करना पड़ा। हालांकि आजम के पुरजोर विरोध के बावजूद रामपुर से दोबारा सांसद बनकर अपना लोहा मनवाया।
नई पारी औधरी अजित सिंह के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकदल से शुरू की है। ग्लैमरस चेहरे और जाट आरक्षण को अपना मुख्य मुद्दा बनाने के कारण बिजनौर में मुख्य लड़ाई में तो शामिल हो गईं, पर स्थानीय लोकदल नेताओं से अभी सामंजस्य नहीं बिठा पा रही हैं। विरोधी बाहरी होने को भी मुद्दा बना रहे हैं।
मुख्य मुकाबला भाजपा के कुंवर भारतेन्द्र से है जिनका नाम मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान सुर्खियों में आया था। जीतने पर बिजनौर को मुंबई बना देने की घोषणा के बाद एक बार फिर चर्चा में आईं। विरोधी सवाल पूछ रहे हैं कि रामपुर में कितना विकास किया है? जया प्रदा अब बिजनौर से राष्ट्रीय लोकदल पार्टी की ओर से चुनाव मैदान में हैं। जाट आरक्षण व मुजफ्फरनगर दंगों से बदले माहौल का इन्हे फायदा मिल सकता है।
नगमा का रानीतिक ग्लैमर
पिता हिंदू व मां के मुस्लिम होने के नाते कांग्रेस का संदेश देने में सफल। पर मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिमी यूपी में उभरे सांप्रदायिक उभार के बीच अपनी जगह बना पाना बड़ी चुनौती है। पिछले कई बरसों से कांग्रेस में सक्रिय नगमा का नाम कभी विधानसभा तो कभी राज्यसभा के लिए उछलता रहा है
तमिल, तेलुगु, बांग्ला, हिन्दी के अलावा ‘दुलहा मिलल दिलदार’ व ‘पंडित जी बताईं बियाह कब होई’..जैसी भोजपुरी फिल्मों की नायिका होने के नाते पूर्वी यूपी के किसी सीट से लड़ने में ज्यादा दिलचस्पी थी, पर हाईकमान ने भेज दिया पश्चिमी यूपी। उनका रोड शो देखने को लोग उमड़े पर यह भीड़ वोट में कितनी तब्दील होगी, कहना मुश्किल है।
चर्चा इस बात की भी है कि उनके पक्ष में प्रचार करने सलमान खान सरीखे कई फिल्मी सितारे आएंगे। नगम अब मेरठ सीट से कांग्रेस से चुनाव लड़ रही हैं। कोई ठोस वोट बैंक न होना इनकी मुश्किल है।
जमाने के फिल्मी नेता
स्कूली जमाने में समाजवादी युवजन सभा के सक्रिय कार्यकर्ता रहे राज बब्बर का राजनीतिक अभ्युदय वीपी सिंह के जमाने में हुआ। बाद में मुलायम सिंह के सेक्युलरिज्म से प्रभावित होकर काफी दिनों तक उनके साथ रहे।
सपा प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने लखनऊ में भाजपा के दिग्गज नेता अटलबिहारी वाजपेयी को तगड़ी चुनौती दी। बाद में आगरा से सांसद बने। सपा से विद्रोह करने के बाद वीपी के साथ जनमोर्चा सक्रिय किया जो 2007 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह फेल रहा।
फिर कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर सपा के असर वाली फीरोजाबाद सीट पर हुए उपचुनाव में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को हराया। अब राहुल राग अलापते हुए गाजियाबाद से किस्मत आजमा रहे हैं। राजबब्बर अब गाजियाबाद सीट कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं। यहां इनके प्रितद्वंदी भाजपा से जनरल वीके सिंह हैं।
भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार रविकिशन की कांग्रेस से नजदीकी पुरानी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी जिले की किसी सीट से चुनाव लड़ने की काफी चर्चा रही। फिलहाल सपा के हैवीवेट प्रत्याशी पारसनाथ यादव से उनका मुकाबला है।
पुराने सपाई केपी यादव के बागी होकर निर्दल ताल ठोकने से थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं पर स्थानीय कांग्रेसियों का भरपूर सहयोग न मिल पाने की दिक्कत भी है। मूल रूप से जिले की केराकत तहसील के बसाई बिसुई गांव के रहने वाले रविकिशन के मुंबई जाने के बावजूद परिवार के सदस्य अभी भी गांव में ही रहते हैं। फिलहाल रविकिशन ने जौनपुर में डेरा डाल दिया है।
लोग उनको देखते, सुनते तो हैं पर वोट देंगे भी या नहीं यह तो नतीजे ही बताएंगे। मुकाबले में तीन यादव (पारसनाथ, केपी, उमाकांत) आ जाने से भी उनकी उम्मीदें परवान चढ़ी हैं। भोजपुरी फिल्मों का अभिनेता होने के नाते घर-घर तक पहुंच है। यह अब जौनपुर सीट से कांग्रेस की टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं।