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शिंदे या मीरा कुमार हो सकते हैं कांग्रेस के पीएम उम्मीदवार

Thu, 12 Dec 2013 12:54 AM IST
विनोद अग्निहोत्री/अमर उजाला, दिल्ली
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई हार और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली में कांग्रेस के जनाधार में जबर्दस्त सेंधमारी से हिले कांग्रेस नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में दलित प्रधानमंत्री का ट्रंप कार्ड खेलने पर गंभीरता से मंथन शुरु हो गया है।
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भले ही मीडिया में नंदन नीलकेणि का नाम उछाला जा रहा हो लेकिन उम्मीदवारी के लिए गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के नामों और उनके गुण दोष पर विचार किया जा रहा है। दलित प्रधानमंत्री का कार्ड खेलकर कांग्रेस लोकसभा चुनावों में देश का राजनीतिक एजेंडा बदलना चाहती है।

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यह जानकारी देने वाले सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा विधानसभा चुनावों में हार के बाद अपने संवाददाता सम्मेलन में यह कहने के बाद कि उचित समय पर कांग्रेस अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का ऐलान करेगी, पार्टी में इसके लिए नामों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
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पार्टी में आम तौर पर राहुल गांधी का नाम लोग ले रहे हैं, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद राहुल को लेकर कई किंतु-परंतु लगने लगे हैं और पार्टी अब राहुल को लेकर कोई जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं है।

पढ़ें:- मोदी के मुकाबले राहुल नहीं, निलेकणी को उतारेगी कांग्रेस!

एक तरफ मणिशंकर अय्यर और दस जनपथ के वफादार नेता राहुल को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव में उतरने की वकालत करते हुए यह कह रहे हैं कि अगर पार्टी हार कर विपक्ष में भी बैठती है तो कोई हर्ज नहीं है, पांच साल बाद जब मोदी, भाजपा और आप का बुखार उतर जाएगा तो फिर कांग्रेस का ग्राफ चढ़ेगा और राहुल की अगुआई में तब सरकार बनाना ज्यादा ठीक होगा।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व हार की ऐसी मानसिकता से चुनाव मैदान में उतरने के हक में नहीं है। खुद राहुल भी इस मुद्दे पर किसी निर्णय पर अभी तक नहीं पहुंच सके हैं, लेकिन दलित प्रधानमंत्री के एजेंडे के साथ चुनाव में उतरने का सुझाव उन तक भी पहुंच गया है।

सूत्रों का कहना है कि इस पर उनकी राय भी सकारात्मक है। सुझाव है कि अगर कांग्रेस किसी दलित नेता को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रुप में पेश करे तो देश भर में दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों का जनाधार पार्टी के पीछे एकजुट हो जाएगा।

इसका बड़ा फायदा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी मिलेगा जहां पार्टी के पास कोई ठोस जनाधार नहीं बचा है। इस जनाधार के साथ मुस्लिम और अन्य वर्गो का कांग्रेस जनाधार मिल जाने से पूरा परिदृश्य बदल सकता है और मोदी और आप पार्टी के कार्ड को कमजोर किया जा सकता है।

इससे पूरी सियासी बहस महंगाई, भ्रष्टाचार की बजाय दलितों, आदिवासियों, गरीबों के राजनीतिक सशक्तीकरण पर केंद्रित हो जाएगी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर भी विराम लगेगा।

दलित कार्ड के पैरोकारों का कहना है कि क्योंकि भाजपा अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी है, इसलिए अब पीछे नहीं लौट सकती और अन्य बसपा, सपा, जद(यू), वाम दल समेत अन्य दल दलित प्रधानमंत्री के विरोध का जोखिम मोल नहीं ले सकेंगे।

कांग्रेस के दलित चेहरे के रूप में मुख्य रूप से सुशील कुमार शिंदे और मीरा कुमार के ही नाम हैं। शिंदे के पक्ष में यह बात जाती है कि पार्टी और परिवार के प्रति उनकी वफादारी असंदिग्ध है। उन्हें मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री के रूप में काम करने का लंबा प्रशासनिक अनुभव है और अभी वह लोकसभा में पार्टी और सदन के नेता भी हैं।

वरिष्ठता के लिहाज से उन्हें लेकर कोई दिक्कत नहीं है और उन्हें आगे करके कांग्रेस महाराष्ट्र में न सिर्फ अपने दलित जनाधार को एकजुट कर सकती है, बल्कि शरद पवार और शिवसेना के प्रभाव को भी कम कर सकती है। लेकिन शिंदे की उम्र और पिछले कुछ समय से उनके विवादास्पद बयानों ने उनकी छवि को कमजोर किया है।

ऊर्जा मंत्री और गृह मंत्री के रूप में भी उन्हें कमजोर प्रशासक माना जा रहा है, लेकिन उनके कार्यकाल में कसाब और अफजल गुरु को फांसी इसका जवाब भी है।

शिंदे के पक्ष में एक तर्क यह भी है कि मुसलमानों के बीच उनकी लोकप्रियता है क्योंकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने आतंकवाद के आरोप में बंद कई निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की रिहाई के मामलों में बेदह उदार रुख अपनाया।

विवादित बयानों से चर्चा में रहे
हाल ही मे गृह मंत्री के रूप में राज्य सरकारों को यह निर्देश भी जारी किए कि आतंकवाद के आरोप में किसी निर्दोष अल्पसंख्यक युवक को पुलिस बेवजह परेशान न करे। लेकिन कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में आरएसएस और हिंदू आतंकवाद पर उनके बयान को लेकर खासा विवाद भी हुआ था और बाद में उसके लिए उन्हें खेद भी व्यक्त करना पड़ा था।

वहीं लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद मीरा कुमार ने लगातार अपनी छवि को निर्विवाद और बेहतर बनाया है। अंग्रेजी हिंदी पर उनका बराबर अधिकार, विदेश सेवा की पृष्ठभूमि और भाषण शैली उनके पक्ष में जाती है।

मीरा कुमार छोड़ चुकी हैं एक बार कांग्रेस
पारिवारिक सियासी विरासत और पिता जगजीवन राम की दलितों के बीच लोकप्रियता मीरा कुमार की ताकत और कमजोरी दोनों है। उन्हें आगे लाकर कांग्रेस उत्तर भारत विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश में दलितों को गोलबंद कर सकती है, क्योंकि वह इस इलाके में दलितों की सबसे प्रभावशाली बिरादरी से आती हैं।

लेकिन जगजीवन राम और इंदिरा गांधी के मतभेदों और कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में जाने का इतिहास भी कांग्रेस नेतृत्व को याद है। खुद मीरा कुमार भी एक बार कांग्रेस छोड़ चुकी हैं। साथ ही केंद्रीय मंत्री के रूप में उनके मंत्रालय के कामकाज पर भी कई सवाल उठते रहे हैं।
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