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यौन उत्पीड़न संबंधी अध्यादेश से महिला संगठन नाखुश

Sat, 02 Feb 2013 08:48 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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महिला अधिकार समूहों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के यौन उत्पीड़न और हिंसा से संबंधित अध्यादेश को नकार दिया है। सरकारी पहल को लोगों के साथ धोखा और भद्दा मजाक बताते हुए महिला समूहों ने राष्ट्रपति से अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करने की गुजारिश की है।
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एक दर्जन से ज्यादा संगठनों ने मीडिया को दिए गए संयुक्त बयान में सरकार को चेतावनी दी कि यदि जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया तो फिर से सड़कों पर संघर्ष किया जाएगा।

महिला अधिकारों पर काम करने वाली वकील वृंदा ग्रोवर, जागोरी की सुनीता धर, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेंस एसोसिएशन की कविता कृष्णन और पार्टनर्स फॉर लॉ एंड डेवलपमेंट की मधु मेहरा शामिल ने केंद्र सरकार के अध्यादेश पर नाखुशी जताई है।
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मधु मेहरा ने कहा कि सरकार ने आंदोलनकारियों को धोखा दिया है। अध्यादेश तैयार करते समय जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट को नकार दिया गया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति अगर महिलाओं को देश का नागरिक मानते हैं तो उन्हें अध्यादेश पर वीटो कर देना चाहिए। अब इसकी नैतिक जिम्मेदारी उन्हीं पर है।

वृंदा ग्रोवर ने कहा कि इस तरह चुपके से अध्यादेश जारी करने से हमारा लोकतंत्र कमजोर होगा। सरकार को वर्मा रिपोर्ट में की गई सिफारिशों को पूरी तरह से लागू करना चाहिए।

कविता कृष्णन ने कहा कि वर्मा रिपोर्ट के अलावा कई अहम चीजें हैं, जिनसे महिलाओं की समस्या बढ़ेगी। इसमें वैवाहिक जीवन में दुष्कर्म को स्वीकार करना, यौन हिंसा और दुष्कर्म के मामले में सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ सुनवाई की गैर जरूरी औपचारिकताएं और सहमति से बने यौन संबंधों की परिभाषा को बदलने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

अगर सरकार जल्द इस ओर ध्यान नहीं देगी तो फिर संघर्ष के लिए सड़कों पर उतरेंगे। बजट सत्र में संसद पर पूरी तरह दबाव बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि महिला संगठन सोमवार को सरकार की कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगी।

‘सत्र से पहले अध्यादेश लाना गैर लोकतांत्रिक’
जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर महिलाओं के प्रति यौन हिंसा संबंधी कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश लाने के केंद्र सरकार के फैसले पर माकपा ने कड़ा ऐतराज जताया है। माकपा ने संसद सत्र से ठीक पहले इस तरह के कानून पर अध्यादेश लाने के सरकार के फैसले को गैर लोकतांत्रिक बताया है।

पोलित ब्यूरो की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह अध्यादेश न तो संवैधानिक प्रक्रिया की दृष्टि से सही है और न ही यह वर्मा समिति की मूल सिफारिशों पर ही खरा उतरता है। एसिड अटैक के मामलों में पीड़िता को आर्थिक क्षतिपूर्ति का नियम बनाने की भी सलाह दी गई थी।

अध्यादेश में इन सिफारिशों को अनदेखा किया गया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार एक गंभीर मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए जल्दबाजी में अध्यादेश ले आई है। वर्मा समिति ने कानून में संशोधन के जरिए सरकारों की जवाबदेही के साथ ही सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार जैसे मामलों को भी आपराधिक कानून के दायरे में लाए जाने का सुझाव दिया है।

उक्त सुझावों को नए कानून के लिए जारी अध्यादेश में शामिल नहीं किया गया है। माकपा ने कहा कि जहां तक मौत की सजा का सवाल है तो रेप के कारण हुई मौत के मामले में भी यह कानून लागू होता है।
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